Navratri Special 2023 – पढ़िए “मां” आदि शक्ति “महागौरी” की पावन “कथा” – जानिए कैसे बना “भव्य स्वरुप”

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UP Desk – भक्तों और देवी सज्जनों जैसा की आप जानते हो कि वर्तमान में शारदीय नवरात्रि के पावन दिनों का समय है। जिसमें हम सभी को आदि शक्ति मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों के दर्शन और पूजा अर्चना का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आज नवरात्रि का आठवां दिन है जो माता रानी महागौरी के लिए समर्पित है, जिनकी आराधना मात्र से बड़े-बड़े संकट दूर भाग जाते हैं, और मनचाहा फल प्राप्त होता है। तो चलिए आज हमारे साथ दर्शन करते हैं मां महागौरी के और जानते हैं उनकी पावन कथा और उनकी आराधना का मुख्य मंत्र। 
नवरात्रि के आठवें दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। इनका रूप पूर्णतः गौर वर्ण है। इनकी उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है। इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है। ये अमोघ फलदायिनी हैं और इनकी पूजा से भक्तों के तमाम कषाय-कल्मष धुल जाते हैं। पूर्व संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। 
 
मंत्र इस प्रकार है
 
ॐ श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:।
मां दुर्गा को आदि शक्ति, भवानी और अन्य कई नामों से जाना जाता है। 
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पौराणिक कथाओं के अनुसार मां का जन्म दैत्यों के विनाश के लिए हुआ था। वैसे तो सारा साल ही माता की पूजा की जाती है लेकिन नवरात्रों के दौरान इनके विशेष पूजन व उपाय किए जाते हैं। कहा जाता है कि नवरात्रों के समय नौ दिन माता रानी पृथ्वी पर आकर भक्तों के बीच रहती हैं। इसलिए मां को खुश करने के लिए भक्त विधि-विधान पूर्वक आरती, पूजा एवं दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं।
मां दुर्गा की उत्पत्ति कैसे हुई
 
एक बार सभी देवगण असुरों के अत्याचारों से तंग आ चुके थे। तब ब्रह्माजी ने उन्हें बताया कि दैत्यराज को ये वर मिला है कि उसकी मौत कुंवारी कन्या के हाथ से होगी। तभी सभी देवों को एक तरकीब सुझी। उन्होंने मिलकर अपनी-अपनी शक्तियों से एक देवी को प्रकट किया। विभिन्न देवताओं की देह से निकले हुए तेज से ही देवी के अलग-अलग अंग बने।भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से मस्तक और बाल, विष्णु के तेज से भुजाएं, इंद्र के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से नितंब, ब्रह्मा के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की उंगलियां, प्रजापति के तेज से सारे दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौंहें, वायु के तेज से कान तथा अन्य देवताओं के तेज से देवी के भिन्न-भिन्न अंग बने। फिर शिवजी ने उस महाशक्ति को अपना त्रिशूल दिया, लक्ष्मी जी ने कमल का फूल, विष्णु ने चक्र, अग्नि ने शक्ति व बाणों से भरे तरकश, प्रजापति ने स्फटिक मणियों की माला, वरुण ने दिव्य शंख, हनुमानजी ने गदा, शेषनाग ने मणियों से सुशोभित नाग, इंद्र ने वज्र, भगवान राम ने धनुष, वरुण देव ने पाश व तीर, ब्रह्मा ने चारों वेद तथा हिमालय पर्वत ने सवारी के लिए सिंह प्रदान किया। इसके अतिरिक्त समुद्र ने बहुत उज्जवल हार, कभी न फटने वाले दिव्य वस्त्र, चूड़ामणि, दो कुंडल, हाथों के कंगन, पैरों के नूपुर तथा अंगुठियां भेंट कीं।
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इन सब वस्तुओं को देवी ने अपनी अठारह भुजाओं में धारण किया। मां दुर्गा इस सृष्टि की आद्य शक्ति हैं यानी आदि शक्ति हैं। पितामह ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और भगवान शंकर उन्हीं की शक्ति से सृष्टि की उत्पत्ति, पालन-पोषण और संहार करते हैं। 
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अन्य देवता भी उन्हीं की शक्ति से शक्तिमान होकर सारे कार्य करते हैं। मां के इस तेज को देखकर दैत्यराज बहुत डर गया था लेकिन देवी ने अपने शेर और शस्त्रों से उसे मार डाला। तभी से माता को मां दुर्गा के नाम से पुकारा जाने लगा।
प्रेम से बोलो – “जय माता दी” 

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