वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा, Pilibhit Tiger Reserve में राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ
वन्यजीव संरक्षण को नई दिशा: Pilibhit Tiger Reserve में पाँच दिवसीय कार्यशाला शुरू
सामुदायिक स्वयंसेवकों को मज़बूत बनाने के उद्देश्य से जुटे देशभर के बाघ मित्र और विशेषज्ञ
पीलीभीत वन्यजीव संरक्षण को सशक्त बनाने और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने की दिशा में पीलीभीत टाइगर रिजर्व और विश्व प्रकृति निधि भारत (WWF) ने मिलकर एक बड़ी पहल की है। इसी क्रम में आज पाँच दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। यह आयोजन पूरनपुर रोड स्थित जे.पी. होटल में हुआ, जहाँ सुबह से ही विभिन्न प्रभागों के अधिकारी, विशेषज्ञ, स्वयंसेवक और 10 राज्यों से आए बाघ मित्र उपस्थित रहे।
Pilibhit Tiger Reserve:यह है कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य
इस कार्यशाला का मुख्य लक्ष्य सामुदायिक स्वयंसेवकों की भूमिका को मज़बूत करना और उन्हें इस तरह प्रशिक्षित करना है कि वे न केवल वन्यजीवों की सुरक्षा में मदद करें, बल्कि गाँव-गाँव जाकर लोगों को भी जागरूक कर सकें।
इसके ज़रिए प्रशासन यह संदेश देना चाहता है कि जंगल और उसमें रहने वाले जीव-जंतु केवल सरकार या वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि समाज का हर वर्ग इस संरक्षण यात्रा में भागीदार है।
Pilibhit Tiger Reserve:फिल्म प्रदर्शन के साथ विशेषज्ञों ने साझा किये अनुभव
शुरुआत में पीलीभीत टाइगर रिजर्व के बाघ मित्रों पर आधारित एक लघु फिल्म दिखाई गई। फिल्म ने साफ किया कि किस तरह गाँव के युवाओं और किसानों ने मिलकर बाघों और अन्य वन्यजीवों के संरक्षण में अहम योगदान दिया है।
कार्यशाला में आए विशेषज्ञों ने भी अपने-अपने अनुभव साझा किए और बताया कि सामुदायिक स्तर पर किए गए छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं।
मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए पूरा जोर
पिछले कुछ वर्षों में पीलीभीत और आसपास के इलाकों में बाघों की संख्या बढ़ी है। यह पर्यावरण के लिए तो सकारात्मक है, लेकिन इसके चलते मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ा है। कभी खेतों में घुसकर जंगली जानवर फसलें नुकसान पहुँचाते हैं तो कभी गाँवों में प्रवेश कर जाते हैं।
इन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए किसानों को फसल क्षति का मुआवजा प्रमाणपत्र भी वितरित किए गए। यह पहल किसानों और ग्रामीणों में भरोसा पैदा करने का प्रयास है कि सरकार उनके नुकसान की भरपाई के लिए भी साथ खड़ी है।
Pilibhit Tiger Reserve: वन भूमि पर अतिक्रमण और समाधान का सरल रास्ता
विशेषज्ञों ने बताया कि संघर्ष की एक बड़ी वजह वन भूमि पर बढ़ता अतिक्रमण है। जब जंगल का दायरा घटता है तो जानवर भोजन और पानी की तलाश में गाँवों और खेतों की ओर रुख करते हैं।
कार्यशाला में यह सुझाव सामने आया कि वन भूमि की पहचान कर उसका सत्यापन किया जाए और जहाँ संभव हो वहाँ वन क्षेत्र का विस्तार किया जाए। इससे वन्यजीवों को पर्याप्त प्राकृतिक आवास मिलेगा और इंसानों के साथ उनका टकराव कम होगा।
Pilibhit Tiger Reserve: प्रधानमंत्री भी कर चुके हैबाघ मित्र कार्यक्रम की विशेष प्रशंसा
कार्यक्रम के दौरान यह भी याद किया गया कि प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में पीलीभीत टाइगर रिजर्व के बाघ मित्र कार्यक्रम की विशेष प्रशंसा की थी। यह इस बात का प्रमाण है कि स्थानीय स्तर पर शुरू हुआ यह प्रयास अब राष्ट्रीय महत्व हासिल कर चुका है।
इस कार्यशाला में शामिल 10 राज्यों के बाघ मित्रों को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने अनुभव साझा करें और अपने-अपने क्षेत्रों में भी संरक्षण कार्यों को और आगे बढ़ाएँ।
ये थे वन संरक्षण की दिशा तय करने वाले शीर्ष अधिकारी और विशेषज्ञ
कार्यशाला के मंच पर वन्यजीव संरक्षण और प्रशासनिक तंत्र से जुड़े कई बड़े अधिकारी और विशेषज्ञ एक साथ उपस्थित रहे। इनमें सुनील चौधरी, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं विभागाध्यक्ष लखनऊ, ललित कुमार वर्मा अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (प्रोजेक्ट टाइगर) लखनऊ, पी.पी. सिंह, मुख्य वन संरक्षक, रुहेलखंड जोन, बरेली, ज्ञानेन्द्र सिंह, जिलाधिकारी पीलीभीत, यशमगन सेठिया निदेशक WWF इंडिया, मनीष सिंह प्रभागीय वनाधिकारी पीलीभीत और डॉ. उत्कर्ष शुक्ला, निदेशक नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान लखनऊ शामिल रहे। इनके साथ WWF की टीम, विभिन्न राज्यों से आए बाघ मित्र और मीडिया प्रतिनिधियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को और भी सार्थक बना दिया।
Pilibhit Tiger Reserve: पहले दिन के कार्यक्रम का समापन और आगे की रूपरेखा
पहले दिन का समापन स्मृति चिन्ह भेंट करने और धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
यह कार्यशाला 19 सितम्बर तक जारी रहेगी। आने वाले दिनों में यहाँ वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर समूह चर्चा, प्रशिक्षण और व्यवहारिक अभ्यास भी होंगे।
पीलीभीत की यह कार्यशाला केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी की ओर बढ़ाया गया कदम है। उद्देश्य साफ है—जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण समाज को इस अभियान से जोड़ना।
यदि समुदाय, प्रशासन और विशेषज्ञ मिलकर काम करें तो आने वाले समय में न केवल बाघों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी बल्कि इंसान और वन्यजीव के बीच संतुलन भी कायम हो सकेगा।
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