खून से लिखा पत्र, हाईवे की दुर्दशा पर किसानों आंदोलन तेज
खून से लिखा पत्र, आगरा-ग्वालियर हाईवे की बदहाली के विरोध में किसानों ने खून से पत्र लिखा। तीन दिन से भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेताओं ने दी भू-समाधि की चेतावनी।
खून से लिखा पत्र, आगरा-ग्वालियर हाईवे की हालत बद से बदतर, किसान आक्रोशित
आगरा जनपद के नगला माकरोल क्षेत्र में स्थित आगरा-ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग की जर्जर स्थिति से त्रस्त होकर अब किसानों का सब्र जवाब देने लगा है। तीन दिनों से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे किसान नेताओं का दर्द अब गुस्से में तब्दील हो चुका है। उन्होंने खुद के खून से पत्र लिखकर केंद्र सरकार और प्रदेश के शीर्ष नेताओं से हाईवे के जीर्णोद्धार की गुहार लगाई है।
खून से लिखा पत्र, सिस्टम को झकझोरने की कोशिश
धरने पर बैठे किसान नेता श्याम सिंह चाहर ने अपने खून से पत्र लिखकर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से मांग की है कि बदहाल हाईवे को तुरंत दुरुस्त किया जाए और लंबित नाले का निर्माण कार्य शुरू हो। उन्होंने कहा कि यह पत्र किसी प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि गंभीर जनवेदना का प्रतीक है, जिसे अब अनदेखा नहीं किया जा सकता।
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एनएचएआई और पीडब्ल्यूडी अधिकारियों पर गंभीर आरोप
किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि NHAI और PWD के अधिकारी स्थानीय भू-माफियाओं के इशारे पर काम कर रहे हैं और जानबूझकर सड़क और नाले के निर्माण को रोक रहे हैं। यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि किसानों और आम जनता के खिलाफ साजिश है।
खून से लिखा पत्र, प्रशासनिक उपेक्षा से नाराज़ किसान, दिया भू-समाधि का ऐलान
श्याम सिंह चाहर ने चेतावनी दी कि अगर जल्द उनकी मांगें नहीं सुनी गईं, तो किसान जिलाधिकारी कार्यालय की ओर लेटकर मार्च करेंगे और फिर भी अनसुनी हुई तो बदहाल हाईवे पर गड्ढा खोदकर भू-समाधि लेने को मजबूर होंगे। यह चेतावनी प्रशासन के लिए बेहद गंभीर संदेश है कि अब जनता सिर्फ पत्र और ज्ञापन से नहीं, बलिदान की सीमा तक जाकर अपना हक मांगेगी।
प्रशासन की चुप्पी से गुस्सा, जनता का भरोसा डगमगाया
किसानों का कहना है कि धरने को तीन दिन हो गए, लेकिन आज तक कोई जिम्मेदार अधिकारी हाल जानने नहीं पहुंचा। यह स्पष्ट करता है कि प्रशासन को जनता की पीड़ा से कोई सरोकार नहीं। जनता अब खुद अपने हक के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर है।
आखरी बात
आगरा में हाईवे की बदहाली अब सिर्फ एक निर्माण की बात नहीं रही, यह किसानों की अस्मिता और संघर्ष का प्रतीक बन चुकी है। जब सरकारें सुनने को तैयार नहीं, तो जनता को खून से लिखे शब्दों का सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में अब देखना यह है कि क्या शासन-प्रशासन इन खामोश लेकिन खून से रंगे हुए शब्दों की चीख को सुनेगा?
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