जानिए इस साल किस तरह से होगी करवा चौथ की पूजा, सुहागिनों का होता है आस्था पर्व, पढ़िए व्रत की पूरी विधि
इस व्रत की विशेषता यह है कि इसे केवल सौभाग्यवती स्त्रियाँ ही रखती हैं। यद्यपि जाति, संप्रदाय या आयु का कोई बंधन नहीं है — सभी विवाहित महिलाएं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक कर सकती हैं।
जानिए पूजन का धार्मिक महत्व
करवा चौथ के दिन महिलाएं भगवान शिव माता पार्वती और गणेश जी की पूजा करती हैं। पार्वती जी और शिव जी का पूजन इसलिए किया जाता है क्योंकि वे आदर्श पति-पत्नी के रूप में पूज्य माने जाते हैं। इसलिए, इस व्रत से न केवल दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है बल्कि परिवार में सुख-समृद्धि भी आती है।
इसके अलावा, करवा चौथ पर चंद्रमा की पूजा का विशेष महत्व होता है। चंद्रमा को शीतलता, पूर्णता और मानसिक शांति का प्रतीक माना गया है। कहा जाता है कि जैसे चंद्रमा समुद्र के ज्वार-भाटे को नियंत्रित करता है, वैसे ही वह मनुष्य के मन को भी संतुलित करता है। अतः सुहागिनें चंद्रमा की आराधना करती हैं ताकि उनके पति के जीवन में प्रेम, प्रसिद्धि और दीर्घायु का आशीर्वाद बना रहे।
करवा चौथ व्रत विधि को जरूर पढ़ें
इस व्रत को 12 या 16 वर्षों तक लगातार रखने की परंपरा है। व्रत पूर्ण होने के बाद उद्यापन किया जाता है, किंतु कई महिलाएं इसे आजीवन निभाती हैं।
इस तरह से करें पूजन की तैयारी
सुबह स्नान के बाद घर की दीवार पर गेरू से चौक बनाएं और पिसे चावलों से करवा का चित्र बनाएं, जिसे “वर” कहा जाता है। इस चित्रण को “करवा धरना” कहा जाता है।
यह होनी चाहिए पूजन सामग्री
* जल से भरा लोटा या मिट्टी का टोंटीदार करवा
* गेहूं, शक्कर बूरा, रोली, चावल
* सुहाग सामग्री — बिंदी, चूड़ी, सिन्दूर, लहठी आदि
* 13 दाने गेहूं या चावल के
करवा पर स्वस्तिक बनाएं और पूजन के समय मंत्र उच्चारण करें — “नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्। प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥”
जानिए कथा श्रवण और आशीर्वाद
पूजन के पश्चात महिलाएं करवा चौथ की कथा कहती या सुनती हैं। कथा पूरी होने पर सास के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया जाता है और करवा उन्हें भेंट दिया जाता है।
चंद्र दर्शन और व्रत खोलना
रात्रि में चंद्रमा के उदय के बाद सुहागिनें छलनी की ओट से पहले चंद्रमा को और फिर अपने पति को देखती हैं। इसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति से आशीर्वाद लिया जाता है।
व्रत खोलते समय यह ध्यान रखें कि बताशा पूरा साबुत खाएं — आधा या टूटा हुआ नहीं, क्योंकि यह चंद्रमा की पूर्णता और दांपत्य संबंध की अखंडता का प्रतीक है। इसके पश्चात पति को भोजन कराएं और स्वयं भी भोजन ग्रहण करें।
जानिए व्रत के विशेष नियम
इस दिन सुहागिनों को कुछ नियमों का पालन करना चाहिए —
* सिन्दूर, चूड़ी, बिंदी जैसी सुहाग सामग्री को कभी भी कचरे में न फेंकें।
* यदि चूड़ी टूट जाए तो उसे पूजा स्थान पर रख दें।
* सुई, कैंची या चाकू जैसी तेज वस्तुओं का प्रयोग न करें।
इन नियमों का पालन करने से व्रत का फल और भी शुभ माना जाता है।
एक समय की बात है, सात भाइयों की एक बहन का विवाह एक राजा से हुआ था। करवा चौथ के दिन उसने व्रत रखा, लेकिन भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी। भाइयों से उसकी अवस्था देखी न गई, उन्होंने दर्पण से नकली चाँद दिखा दिया। बहन ने व्रत तोड़ दिया।
इसी समय उसके पति की तबीयत बिगड़ गई। रानी व्यथित होकर अपने ससुराल लौटी। रास्ते में उसकी भेंट मां पार्वती से हुई। देवी ने बताया कि यह सब उसके अधूरे व्रत का परिणाम है। रानी ने पश्चाताप किया और देवी से क्षमा मांगी। मां पार्वती ने उसे व्रत की विधि बताई। जब रानी ने पूरी श्रद्धा से करवा चौथ का व्रत दोबारा किया, तो उसके पति पुनः जीवित हो उठे।
इसलिए कहा जाता है कि करवा चौथ का व्रत पति की दीर्घायु और वैवाहिक सुख का प्रतीक है।
यह है करवा चौथ की ऐतिहासिक मान्यता
शास्त्रों में उल्लेख है कि महाभारत काल में द्रौपदी ने भी अपने सुहाग की लंबी आयु और पांडवों की विजय के लिए यह व्रत रखा था। तब से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
आज भी आधुनिक समाज में यह व्रत उतनी ही श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है जितना प्राचीन काल में किया जाता था। महिलाओं के लिए यह न केवल धार्मिक आस्था का पर्व है बल्कि भावनात्मक जुड़ाव और वैवाहिक प्रेम का उत्सव भी है।