Chhath Puja: कांच ही बांस के बहंगिया… घाट-घाट गूंजे छठ गीत, उत्तर भारत बना भक्ति का महासागर
Chhath Puja: आस्था का उत्सव,लोकश्रद्धा, तपस्या और सूर्य उपासना का अद्भुत संगम
भारत की पवित्र मिट्टी आज फिर से आस्था के सागर में डूबी हुई है। हर दिशा में गूंज रही है लोकश्रद्धा की अनुगूंज — “जय छठी मइया!” दीपावली की जगमगाहट के बाद अब जब आकाश में उगते सूर्य की लालिमा छा रही है, तो धरती पर हर घाट, हर पोखरा, हर नदी किनारा भक्तिभाव से आलोकित हो उठा है। महिलाएं सिर पर टोकरी और हाथों में सूप लिए नदी की ओर प्रस्थान कर रही हैं, बच्चों की किलकारियों और मंगल गीतों से वातावरण पवित्र हो उठा है।
आज आरंभ हुआ लोक आस्था का महापर्व छठ, केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, मातृशक्ति और अनुशासन की जीवंत पहचान है। यह वह पर्व है जहाँ सूर्य की उपासना के साथ माँ छठी के प्रति अटूट भक्ति, परिवार के लिए तपस्या और समाज के लिए एकता का संदेश समाहित है। सच कहा जाए तो छठ वह पल है जब भारत की आत्मा अपनी सबसे उज्ज्वल आस्था में नतमस्तक होती है!
सूर्य उपासना और छठी मैया के प्रति श्रद्धा का पर्व
हिंदू धर्म में दिवाली के छठे दिन से शुरू होने वाला यह पर्व भगवान सूर्य और माता छठी (उषा देवी) को समर्पित है।
चार दिनों तक चलने वाले इस अनुष्ठान में भक्त न केवल पूजा करते हैं, बल्कि अपने तन-मन को पूर्ण शुद्ध रखकर 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं। यह व्रत केवल साधना नहीं, बल्कि भक्ति, त्याग और मातृत्व की सर्वोच्च मिसाल है।
चार दिनों की तपस्या — हर दिन का अपना धार्मिक और वैज्ञानिक अर्थ
पहला दिन – नहाय-खाय (25 अक्टूबर):
भक्त पवित्र नदियों में स्नान कर अपने घर को शुद्ध करते हैं और कद्दू-भात जैसे सात्विक भोजन से छठ व्रत की शुरुआत करते हैं।
इसे “शुद्ध तन-मन से आस्था का प्रारंभ” कहा गया है।
दूसरा दिन – खरना (26 अक्टूबर):
इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को गुड़-चावल की खीर और रोटी बनाकर सूर्यदेव को अर्पित करते हैं।
इसके बाद यही प्रसाद व्रती ग्रहण करते हैं — इसे “संपूर्ण आत्मसंयम का दिन” कहा जाता है।
तीसरा दिन – संध्या अर्घ्य (27 अक्टूबर):
आज का दिन छठ का सबसे महत्वपूर्ण दिन है। शाम को जब सूर्य अस्त होते हैं, तब महिलाएं घाटों पर पहुँचकर सूर्य को अर्घ्य देती हैं और “छठ मइया” से संतान की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और परिवार की रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
यह दृश्य पूरे उत्तर भारत में भक्ति का महासागर बन जाता है — सरयू से लेकर गंगा और घाघरा तक हर घाट दीपों से जगमग हो उठता है।
चौथा दिन – उषा अर्घ्य (28 अक्टूबर):
सूर्योदय के समय व्रती पुनः अर्घ्य अर्पित कर व्रत का पारण करती हैं।
उगते सूर्य को अर्घ्य देने का अर्थ है — नए जीवन, नई ऊर्जा और नई शुरुआत का स्वागत।
सूर्य की उपासना क्यों है खास?
छठ पर्व का आधार सूर्य देव की पूजा है, जिन्हें जीवन, ऊर्जा और आरोग्य का देवता माना गया है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी सूर्य उपासना शरीर में विटामिन-D, रोग प्रतिरोधक क्षमता और मानसिक शांति बढ़ाने का प्रतीक मानी गई है।
सदियों से यह पर्व इस विश्वास के साथ मनाया जाता है कि सूर्य की किरणें जब जल के माध्यम से शरीर पर पड़ती हैं, तब वह आत्मिक और शारीरिक शुद्धि का प्रतीक बनती हैं।
लोक संस्कृति और सामाजिक एकता का पर्व
उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में यह पर्व किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी संस्कृति बन चुका है।
गांवों से लेकर महानगरों तक आज हर कोई घाट सजाने में जुटा है — कहीं मिट्टी के दीये जल रहे हैं, कहीं गीत गूंज रहे हैं —
“कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…”
छठ पर्व का दृश्य ऐसा होता है मानो गंगा-घाट भारत की आत्मा बन गए हों।
यह त्योहार महिलाओं के संकल्प, त्याग और मातृत्व के उस अद्भुत भाव को प्रकट करता है जो पीढ़ियों को जोड़ता है।
व्रत का कठिन संकल्प
छठ व्रत सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।
व्रती 36 घंटे तक बिना अन्न-जल ग्रहण किए रहकर सूर्य और छठी मैया की उपासना करते हैं।
यह व्रत सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि एक मानसिक और शारीरिक अनुशासन का भी प्रतीक है।
संध्या और उषा अर्घ्य का शुभ मुहूर्त (2025)
संध्या अर्घ्य: 27 अक्टूबर को शाम 5:20 से 5:45 बजे के बीच
उषा अर्घ्य (पारण): 28 अक्टूबर को सुबह 6:15 से 6:45 बजे के बीच
राष्ट्रीय एकता और श्रद्धा का संदेश
छठ पर्व केवल पूजा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति का जीवंत दर्शन है —
जहाँ सूर्य को साक्षी मानकर आस्था, शुद्धता और संकल्प का संगम होता है।
आज पूरा देश कह रहा है —
“जय छठी मइया! उज्जवल हो हर जीवन, दीप जले हर घाट पर!”