हमने Diwali नहीं मनाई, घर बचाने की खातिर रातभर कपकपाते रहे, महिलाओं ने रो-रो वयां की दास्तां
Diwali की रोशनी में नहीं — घाघरा की तेज़ धार में डूबी आशियाने!
जब बाकी घर दीयों से जगमगाए रहे, गोपाल नगर टांडी के परिवारों ने अपने ही हाथों से घर तोड़कर बंधे पर शरण ली — मुस्कान नहीं, डर के साये में यह दिवाली गुज़री। नदी ने काटा, अधिकारी चुप रहे, और परिवार दिवाली की खुशियाँ भूल कर केवल यह डर सहते रहे कि अगला पल उनका घर पानी में समा न जाए।
घटना — कहाँ और क्या हुआ
यह पीड़ा बलिया जिले के बैरिया तहसील के गोपाल नगर टांडी गाँव की है, जहाँ घाघरा/सरयू नदी की कटान प्रक्रिया इन दिनों भी तेज है। नदी की तेज धारा ने कई इलाकों में जमीन निगल ली — स्थानीय लोगों के बनाए पचास से अधिक मकान या तो नदी में समा चुके हैं या कटान के कगार पर हैं। इस घातक कटान के चलते प्रभावित परिवारों ने अपने बने आशियाने खुद तोड़कर सुरक्षित किनारे और बंधों की ओर भागना शुरू कर दिया। जो बचा-खुचा था, उसे बचाने की हड़बड़ी और बेबसी — यही इस संवादहीन दिवाली की सच्चाई है।
पीड़ित परिवारों की टूटती दास्ताँ — आँसू, यादें और त्यौहार का सूना घर
“हमने इस बार दिवाली नहीं मनाई।” — यह कड़वा सच सीधे परिवारों के मुंह से निकला। परिवार बता रहे हैं कि घर-गृहस्थी, बर्तन, कपड़े — सब कुछ बचाने की होड़ में वे रात-दिन कपकपाते रहे। वृद्ध महिलाएँ कहती हैं कि उनके बुजुर्गों ने भी कभी इतना नुकसान नहीं देखा था, बच्चे चिल्लाते रहे, और महिलाएँ रो-रो कर कहती रहीं कि वे रौशनी के बजाय बंधे पर सोए। दिवाली की मिठाइयाँ और पटाखे कहीं खो गए — उनके लिए तो बस यह सवाल बचा रहा कि अगली साँस कहाँ लें।
प्रशासनिक वादा बनाम जमीनी हकीकत — ठोकरें और खोखला आश्वासन
सरकार और विभागों ने कटान रोकने के लिए जो ठोकर, बोल्डर और बचाव कार्य करने के दावे किये थे, वे कई जगह प्रभावहीन साबित हुए — कुछ ठोकर नदी की तेज़ धारा में ही बह निकले और कुछ कार्य नदी के बीचों-बीच चले गए। प्रभावितों का आरोप है कि ठेकेदार, घटिया सामग्री और अधूरी योजनाओं ने गाँव को बचाने के बजाय क्षति बढ़ाई। इतने बड़े हादसे के बावजूद कई इलाकों में निरीक्षण और राहत का अभाव रहा — और जब तक हालात और बिगड़ते, तक तक कई घर नदी में समा चुके थे। यह नहीं कहा जा सकता कि केवल प्राकृतिक क्रूरता अकेली वजह है, मानवीय भूल और लापरवाही ने भी चोट गहरी कर दी।
Diwali: उजालों की जगह बंधों पर रातें — परिवार कैसे गुज़ारे कर रहे हैं?
बचाने योग्य सामान ले कर, कुछ लोग रिश्तेदारों के यहाँ शरण ले रहे हैं, तो कई परिवार पुराने रेलवे लाइन या ऊँचे बंधों पर ठहर गए हैं। कुछ के पास तो सिर्फ़ एक-एक थैला ही बचा है। वृद्धों को दवा चाहिए, बच्चों को खाना चाहिए — पर कई बार रास्ते कट जाने और सड़कों की खराबी के कारण राहत पहुँचाने में दिक्कतें आ रही हैं। खेतों का पानी में बह जाना और पशु-चरानी का नुकसान — यह सब मिलकर परिवारों पर आर्थिक और मानसिक बोझ बन गया है। इस दिवाली उन्होंने दीप नहीं जले— वे बड़े डर के साये में एक-एक रात गुज़ार रहे हैं।
स्थानीय लोगों का छलका दर्द — “अधिकारी और नेता दिखते नहीं”
कटान पीड़ितों का आरोप है कि इस बार बाढ़ की जबर्दस्त तेज़ी के दौरान कई अधिकारी और नेताओं की उपस्थिति नहीं रही, और जब वे आए भी तो केवल पब्लिसिटी के लिए। लोगों का कहना है कि असली राहत और वैकल्पिक जमीन देने का काम त्वरित और पारदर्शी ढंग से होना चाहिए था—वरना सिर्फ़ निरीक्षण और दिखावे के प्रयास कितने काम के? प्रभावितों ने बताया कि कई जगहों पर जो बचाव कार्य कराए गए, वे स्थायी सुरक्षा प्रदान करने में विफल रहे और कुछ तो नदी के भीतर ही बह गए।
प्राकृतिक आपदा और मानवीय ज़िम्मेदारी — क्या बचाव पर्याप्त था?
घाघरा जैसी नदियाँ अपने प्रवाह और मौसम के अनुसार बदलती रहती हैं, पर वैज्ञानिक और दीर्घकालिक उपायों के अभाव में हर साल यही बर्बादी दोहराई जा सकती है। कटानरोधी उपायों में साइट-सर्वे, गुणवत्ता-नियंत्रण और समुदाय भागीदारी ज़रूरी है — वरना प्रभाव सिर्फ़ अस्थायी उपायों तक ही सिमट कर रह जाएगा। प्रभावितों की मांग है कि सरकार तात्कालिक राहत के साथ-साथ दीर्घकालिक पुनर्वास और जमीन आवंटन का स्पष्ट रोडमैप दे।
सबक और माँगें — क्या तुरंत करना चाहिए?
तात्कालिक राहत — अस्थायी आवास, भोजन, दवाइयाँ, और पशुचराने का इंतज़ाम।
सुरक्षित जमीन आवंटन — प्रभावितों को तत्काल उपयोग के लिए जमीन दी जाए, ताकि वे बंधों पर कमजोर आश्रय न बनाएं।
वैज्ञानिक इंजीनियरिंग उपाय — नदी प्रवाह अध्ययन के आधार पर स्थायी कटान-रोधी संरचना और वृक्षारोपण।
पारदर्शिता व जवाबदेही — ठेके और सामग्री की गुणवत्ता सार्वजनिक हो, दोषी ठेकेदारों पर कार्रवाई हो।
जब दीपक नहीं, तो बंधा पर आशाएँ बचती हैं
गोपाल नगर टांडी के लोग इस दिवाली को शायद कभी भूल न पाएं — न उनकी मुस्कान, न वे टूटते घर, न वे नीरस आँसू। यह केवल बलिया की कहानी नहीं; उन तमाम गाँवों की कहानी है जहाँ नदी की तेज़ धारा और प्रशासनिक कमज़ोरी मिलकर जीवन निगल जाती है। अगर हमें सच्चे अर्थ में मानवता और सुरक्षा चाहिए, तो रोशनी फैलाने से पहले उन लोगों को जीवन भरने का भरोसा देना होगा — वरना हर साल दिवाली के बीच कहीं कोई और परिवार बंधे पर अपना आशियाना तोड़ रहा होगा।
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