Badshahpur Assembly Election: जानिए 2009 से 2019 तक का राजनीतिक विश्लेषण, 2024 में क्या हैं संभावनाएँ ?
Badshahpur Assembly Election: बादशाहपुर विधानसभा सीट हरियाणा के सबसे बड़े विधानसभा क्षेत्रों में से एक है, जिसका गठन 2009 के परिसीमन के बाद हुआ। अब तक इस सीट पर केवल दो चुनाव हुए हैं, लेकिन इन चुनावों में राजनीतिक दलों के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिला है। बादशाहपुर में राजनीतिक माहौल और जातीय समीकरणों का काफी महत्व रहा है।
2009 का पहला चुनाव
बादशाहपुर विधानसभा सीट के पहले चुनाव 2009 में कांग्रेस के राव धर्मपाल ने विजय प्राप्त की। यह कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण जीत थी क्योंकि यह इस सीट का पहला चुनाव था। राव धर्मपाल ने कुल 50,557 वोट हासिल किए और 11,385 वोटों से अपनी जीत सुनिश्चित की। उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी राकेश, जो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ रहे थे, 39,172 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे।
2014 का चुनाव
बादशाहपुर विधानसभा का दूसरा चुनाव 2014 में हुआ, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपना दबदबा बनाया। बीजेपी के राव नरबीर सिंह ने इस चुनाव में 86,672 वोटों के साथ जीत हासिल की। उन्होंने 18,132 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की। इस चुनाव में इंडियन नेशनल लोकदल (INLD) के राकेश दालताबाद ने 68,540 वोट हासिल किए, लेकिन वे चुनाव हार गए।
2019 का चुनाव
2019 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार राकेश दालताबाद ने बाजी मारी और 106,798 वोट प्राप्त करके बीजेपी के मनीष यादव को पराजित किया। राकेश दालताबाद ने 10,157 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की और 47.05% वोट शेयर हासिल किया। बीजेपी के मनीष यादव ने 96,641 वोट प्राप्त किए, लेकिन वे 42.58% वोट शेयर के साथ हार गए।
वोटर प्रोफाइल
बादशाहपुर विधानसभा में 2019 के अनुसार कुल 227,855 वोटर पंजीकृत थे। इनमें 208,697 पुरुष और 186,620 महिला मतदाता शामिल थे, जबकि 10 मतदाता थर्ड जेंडर से थे। बादशाहपुर की जनसंख्या और सामाजिक संरचना के आधार पर जातीय समीकरण भी चुनावी परिणामों पर प्रभाव डालते हैं।
कुल मिलाकर, बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र ने हरियाणा के राजनीतिक परिदृश्य में अहम भूमिका निभाई है। 2009 से लेकर 2019 तक के चुनाव परिणामों से यह साफ है कि मतदाता समय-समय पर बदलाव के लिए तैयार रहते हैं। कांग्रेस, बीजेपी और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच बदलते समीकरण इस सीट को हर चुनाव में रोचक बनाते हैं। आगामी चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकेगी या निर्दलीय उम्मीदवारों का वर्चस्व बना रहेगा।