भगवान श्री राम की वापसी की खबर सुनते ही उज्जवल हो उठी थी अयोध्या नगरी – हनुमान जी ने दिया था संदेश

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UP Desk – भक्तों और द्वी सज्जनों दशानन रावण का वध करने के बाद जब भगवान राम की वापसी की खबर अयोध्या पहुंची थी तो पूरी की पूरी अयोध्या नगरी दीपक से उज्जवल हो उठी थी। सभी उनके स्वागत की तैयारी में जुट गए थे। लेकिन इधर भगवान श्री राम की वापसी में भी कई व्यवधान आए जिन्हे हनुमान जी ने आसानी से हल कर दिए थे। कुछ इसी में एक लीला का वर्णन तुलसीदास जी ने रामायण में किया है। जिसमे राम भक्त हनुमान भगवान के लिए नाव के सामान्य साबित हुए। 
तुलसीदास जी ने भगवान राम को नमस्कार किया है और भगवान के चरणों की वंदना की है और भगवान शिव को भी प्रणाम किया है। रामजी के लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया। अतएव नगर के लोग बहुत आतुर अधीर हो रहे हैं। इतने में सब सुंदर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गए। भरत जी सोच रहे हैं की श्री राम ने हमें भुला तो नही दिया ?
उधर श्री रामजी के विरह समुद्र में भरतजी का मन डूब रहा था। उसी समय पवनपुत्र हनुमान्‌जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गए। मानो उन्हें डूबने से बचाने के लिए नाव आ गई हो।
 
हनुमान जी बोले- देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्री रामजी सकुशल आ गए। शत्रु को रण में जीतकर सीता माता और लक्ष्मणजी सहित प्रभु आ रहे हैं। देवता उनका सुंदर यश गा रहे हैं।
 
ये वचन सुनते ही भरतजी को सारे दुःख भूल गए। भरतजी ने पूछा- तुम कौन हो और कहाँ से आए हो ?
 
हनुमान्‌जी ने कहा हे कृपानिधान! सुनिए, मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ, मेरा नाम हनुमान्‌ है।
 
यह सुनते ही भरतजी उठकर आदरपूर्वक हनुमान्‌जी से गले मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। भरतजी ने कहा हे हनुमान्‌- तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गए दुःखों का अंत हो गया। तुम्हारे रूप में आज मुझे प्यारे रामजी ही मिल गए।
 
फिर भरतजी के चरणों में सिर नवाकर हनुमान्‌जी तुरंत ही श्री रामजी के पास लौट गए और जाकर उन्होंने सब कुशल कही।
 
इधर भरतजी भी हर्षित होकर अयोध्यापुरी में आए और उन्होंने गुरुजी को सब समाचार सुनाया! फिर राजमहल में खबर जनाई कि श्री रघुनाथजी कुशलपूर्वक नगर को आ रहे हैं।
 
खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरतजी ने प्रभु की कुशल कहकर सबको समझाया। नगर निवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित हुए। 
 
   “ऊं नमो नारायणाय”
” जय सियाराम” 

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