इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: सहमति से बने प्रेम संबंध को रेप की श्रेणी में नहीं माना जाएगा और आगे पढ़िए
जानिए पूरा मामला क्या था
दरअसल, एक महिला ने अपने सहकर्मी लेखपाल पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। महिला का कहना था कि आरोपी ने विवाह का झांसा देकर उसके साथ संबंध बनाए। हालांकि सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि दोनों के बीच लंबे समय तक प्रेम संबंध रहे और महिला को यह जानकारी भी थी कि सामाजिक परिस्थितियों के चलते विवाह संभव नहीं है।
पढ़िए कोर्ट का तर्क
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि कोई संबंध पूर्ण सहमति से बना हो और दोनों पक्ष लंबे समय तक उसमें शामिल रहे हों, तो बाद में उसे दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विवाह की संभावना न होने के बावजूद यदि कोई महिला रिश्ते को जारी रखती है, तो यह उसकी स्वेच्छा का हिस्सा माना जाएगा।
इस लिए याचिका हुई खारिज
कोर्ट ने इस आधार पर महिला की दायर याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय का मानना था कि इस मामले में बलपूर्वक या धोखाधड़ी की स्थिति सिद्ध नहीं होती। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म) के अंतर्गत यह अपराध साबित नहीं होता।
फैसले ने दिया सामाजिक संदेश
यह फैसला ऐसे मामलों पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति और विवेकपूर्ण निर्णय को ध्यान में रखना आवश्यक है। अगर दोनों वयस्क आपसी सहमति से रिश्ते में रहते हैं, तो इसे आपराधिक मामला नहीं कहा जा सकता।
झूठे आरोपों से मिल सकती है निजात