चंदे का खेल बेनक़ाब: Supreme Court ने राजनीतिक दलों की फंडिंग पर उठाए सवाल, केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब तलब

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चंदे का खेल बेनक़ाब: Supreme Court ने राजनीतिक दलों की फंडिंग पर उठाए सवाल, केंद्र और चुनाव आयोग से जवाब तलब

Supreme Court ने खोला राजनीतिक चंदे का काला खेल: हजारों दल खाते हैं करोड़ों का चंदा, चुनाव लड़ते नहीं,केंद्र और ECI को नोटिस जारी किया

नई दिल्ली देश की राजनीति में चंदे का खेल एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक जनहित याचिका (PIL) ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि भारत में बड़ी संख्या में राजनीतिक दल सिर्फ चंदा लेने के लिए पंजीकृत हैं। ये दल करोड़ों रुपये का फंड खाते हैं, लेकिन कभी चुनावी मैदान में उतरते ही नहीं। सवाल यह है कि जनता के भरोसे से जुटाया गया यह पैसा आखिर जाता कहां है? सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।

Supreme Court: कितने दल और कितनी सच्चाई?

 भारत में करीब 3,300 राजनीतिक दल पंजीकृत हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से केवल लगभग 300 दल ही सक्रिय रूप से चुनाव लड़ते हैं। बाकी हजारों दल केवल कागजों में दर्ज हैं और असल राजनीतिक गतिविधियों से उनका कोई संबंध नहीं है। इन दलों का अस्तित्व सिर्फ चंदा लेने और पैसों के लेन-देन तक सीमित है।

Supreme Court: ब्लैक मनी को सफेद करने का जरिया

 जांच में यह सामने आया है कि कई छोटे राजनीतिक दल काले धन को सफेद करने का जरिया बन चुके हैं। हाल ही में एक मामले में लगभग 500 करोड़ रुपये छोटे दलों के जरिए घुमाए गए थे। वहीं, एक अन्य जांच में 271 करोड़ रुपये की संदिग्ध रकम का भी खुलासा हुआ। यह साफ दिखाता है कि लोकतंत्र और जनता के नाम पर मिलने वाला फंड असल में ग़लत रास्तों में जा रहा है।

Supreme Court: याचिकाकर्ता का दावा

 याचिका में बताया गया कि अधिकांश छोटे दल केवल नाम के लिए पंजीकृत हैं और उनकी कोई वास्तविक राजनीतिक गतिविधि नहीं है। इन दलों को चंदा देने वालों को आयकर विभाग से टैक्स छूट भी मिल जाती है। ऐसे में चंदे के नाम पर ब्लैक मनी को आसानी से सफेद कर लिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का पूरी तरह अभाव है और जनता के विश्वास के साथ धोखा हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

 सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। अदालत ने पूछा है कि जब ये दल चुनाव में उतरते ही नहीं तो फिर इन्हें पंजीकृत क्यों रखा गया है? जनता के नाम पर जुटाया गया पैसा आखिरकार कहां जा रहा है? और क्या ऐसे दलों को पंजीकरण की अनुमति मिलनी भी चाहिए? अदालत ने सरकार और चुनाव आयोग से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है।

Supreme Court: पारदर्शिता की ज़रूरत

 विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम भारत की चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है। यदि इस मामले पर कड़ी कार्रवाई होती है तो राजनीतिक दलों की फंडिंग पर सख्त निगरानी रखी जा सकेगी। चुनाव आयोग को अधिक अधिकार मिल सकते हैं और उन दलों का पंजीकरण रद्द हो सकता है जो सिर्फ चंदा लेने के लिए अस्तित्व में हैं।

जनता से सीधा जुड़ा मामला

 यह मामला सीधे जनता से जुड़ा है, क्योंकि जनता के नाम पर ही दलों को पैसा मिलता है। उम्मीद की जाती है कि यह पैसा जनता के कल्याण और लोकतंत्र को मजबूत करने में इस्तेमाल होगा। लेकिन जब यही पैसा गलत तरीकों से घूमाया जाता है तो लोकतंत्र कमजोर होता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती से लोगों को भरोसा है कि आगे चलकर राजनीति में साफ-सफाई और पारदर्शिता दोनों बढ़ेंगी।

राजनीतिक चंदे पर चल रही यह सुनवाई आने वाले दिनों में बड़ा मोड़ ले सकती है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने कठोर नियम बनाए तो यह न केवल काले धन और संदिग्ध चंदे पर रोक लगाएगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को भी और मजबूती देगा।

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