सुंदरकांड का महत्त्व: जानिए हनुमान जी का विशेष नाम

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सुंदरकांड का धार्मिक महत्त्व: सुंदरकांड, हनुमान जी की भक्ति और वीरता का अद्वितीय प्रमाण है, जिसे हम सभी ने सुना और विधिपूर्वक पूजन भी किया होगा। लेकिन क्या आपने कभी इस कांड के वास्तविक महत्त्व को समझा है? अगर नहीं, तो आइए जानते हैं कि इस कथा का विशिष्ट महत्त्व क्या है और वीर हनुमान जी का नाम “सुंदर” क्यों और कैसे पड़ा।

सुंदरकांड के बारे में कहा गया है:

“सुंदरे सुंदरे राम: सुंदरे सुंदरीकथा।
सुंदरे सुंदरे सीता सुंदरे किम् न सुंदरम्।।”

हनुमान जी, जो सेवक रूप में भक्ति के प्रतीक हैं, का इस कांड में विशेष महत्त्व है।
यह भी कहा गया है:

“सकल सुमंगल दायक, रघुनायक गुनगान।
सादर सुनहिं ते तरहिं, भव सिंधु बिना जलजान।।”

इसका अर्थ है कि श्री रघुनाथ जी का गुणगान सभी प्रकार के मंगलों को देने वाला है। जो इसे आदर सहित सुनते हैं, वे बिना किसी अन्य साधन के ही भवसागर को पार कर लेते हैं। सुंदरकांड में तीन श्लोक, साठ दोहे और पांच सौ छब्बीस चौपाइयां हैं। इनमें से पहले तीस दोहों में श्री राम के गुणों का वर्णन है। सुंदर शब्द इस कांड में चौबीस चौपाइयों में आया है, जो इस कांड के नाम को सार्थक बनाता है।

इस कांड के नायक रुद्रावतार श्री हनुमान जी हैं। उनका बल, बुद्धि और विवेक का वर्णन अत्यंत सुंदर तरीके से किया गया है। श्रीराम की कृपा पाकर हनुमान जी ने एक ही छलांग में अथाह सागर को पार कर लिया और लंका में प्रवेश किया। बाल ब्रह्मचारी हनुमान जी ने विरह-विदग्ध माता सीता को श्रीराम के विरह का वर्णन इतने भावपूर्ण शब्दों में सुनाया कि स्वयं सीता अपने विरह को भूलकर राम की विरह वेदना में डूब गईं।

इसी कांड में हनुमान जी ने विभीषण को भेद नीति, रावण को भेद और दंड नीति तथा भगवत्कृपा प्राप्ति का मंत्र भी दिया है। पवनसुत ने सीता जी का आशीर्वाद प्राप्त किया और राम काज को पूरा कर श्रीराम को विरह से मुक्त किया तथा उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार सुंदरकांड का नाम और कथा दोनों ही अत्यंत सुंदर और प्रेरणादायक हैं।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह कांड साधना मार्ग के उत्कृष्ट निर्देशन प्रदान करता है। सुंदरकांड का पाठ करने से दरिद्रता, दुखों का दहन, संकटों का निवारण और गृहस्थ जीवन में सुखों की प्राप्ति होती है। पूर्ण लाभ के लिए भगवान में श्रद्धा और विश्वास अत्यंत आवश्यक हैं।

!! जय श्री राम !!
“लाल देह लाली लसे, अरु धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥”
!! जय श्री राम !!

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