Sitapur: 4 साल की दहशत का अंत, खतरनाक बाघिन पिंजड़े में कैद
Sitapur— चार साल की दहशत का अंत, खतरनाक बाघिन पकड़ी गई
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के महोली थाना क्षेत्र में पिछले चार सालों से दहशत फैलाने वाली बाघिन को आखिरकार वन विभाग और दुधवा टाइगर रिजर्व की विशेष टीम ने पकड़ लिया। यह वही बाघिन है जिसने ग्रामीणों और मवेशियों पर 50 से अधिक बार हमला किया और कई लोगों की जान ले ली। नरनी गाँव के आसपास लगातार हमलों से ग्रामीण दहशत में जी रहे थे। लेकिन शनिवार को हुई सफल कार्रवाई के बाद अब लोगों ने राहत की सांस ली है।
Sitapur:बाघिन की दहशत की कहानी
करीब चार वर्षों से यह बाघिन महोली क्षेत्र और उससे लगे गाँवों में आतंक का कारण बनी हुई थी। ग्रामीणों के अनुसार उसने अब तक कई लोगों पर हमला किया, जिनमें कुछ की मौत हो गई और दर्जनों घायल हुए। इतना ही नहीं, इस दौरान कई मवेशी भी उसका शिकार बने। खेती-बारी करने वाले किसानों को खेतों में जाने से डर लगता था, और ग्रामीण शाम ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे।
Sitapur:ट्रैपिंग अभियान की तैयारी
बाघिन को पकड़ने के लिए वन विभाग को लंबे समय से मशक्कत करनी पड़ रही थी। पिछले एक महीने से विशेष अभियान चलाया जा रहा था। दुधवा नेशनल पार्क और कर्तनिया घाट से आए विशेषज्ञों की टीमों ने महोली क्षेत्र में कैंप बनाकर रणनीति तैयार की। जगह-जगह पिंजरे लगाए गए, अस्थायी कमांड सेंटर बनाया गया और ऊँचे मचान तैयार किए गए जहाँ से डॉक्टर और वनकर्मी लगातार निगरानी करते रहे।
रेस्क्यू ऑपरेशन और पकड़ने की प्रक्रिया
शनिवार को यह ऑपरेशन सफल रहा। टीम ने बाघिन को ट्रेंकुलाइज किया और धीरे-धीरे काबू में लिया। करीब 50 से अधिक सदस्यों वाली टीम ने सावधानीपूर्वक उसे पिंजरे में कैद किया। इस दौरान डॉक्टरों की टीम ने उसकी स्थिति की निगरानी की और सुनिश्चित किया कि बेहोशी का असर नियंत्रित रहे। फिलहाल बाघिन को सुरक्षित पिंजरे में रखा गया है और स्वास्थ्य परीक्षण जारी है।
Sitapur:ग्रामीणों ने ली राहत की साँस
बाघिन के पकड़े जाने के बाद ग्रामीणों ने राहत की साँस ली है। चार सालों से वे अंधेरे के बाद घर से बाहर निकलने से डरते थे। बच्चे स्कूल जाने से कतराते थे और किसान खेतों में अकेले काम करने से बचते थे। अब लोगों को उम्मीद है कि उनके जीवन में फिर से सामान्य स्थिति लौटेगी।
Sitapur: dfo का बयान और अपील
सीतापुर के डीएफओ नवीन खंडेलवाल ने बताया कि बाघिन को पकड़ने के लिए टीमें पिछले एक महीने से लगातार लगी हुई थीं। उनके अनुसार:
गाँव के चारों ओर पिंजरे लगाए गए।
डॉक्टरों की टीम ने मचान से लगातार निगरानी की।
दुधवा से विशेषज्ञों की मदद ली गई।
उन्होंने ग्रामीणों से अपील की कि रात में यथासंभव घरों से बाहर न निकलें। खेतों में काम करने वाले किसान ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल करें जिनसे आवाज़ होती हो, ताकि जंगली जानवर पास न आएँ। उन्होंने विशेष रूप से ग्रामीणों को खुले में शौच जाने से परहेज़ करने की सलाह दी ताकि सुरक्षा बनी रहे और हमलों की आशंका घटे।
जंगल और गाँव की सीमा पर संघर्ष
यह घटना केवल एक बाघिन के आतंक की नहीं, बल्कि मनुष्य और वन्यजीव के बीच बढ़ते संघर्ष की कहानी भी है। जंगलों के सिकुड़ने और मानव बस्तियों के विस्तार के कारण ऐसे टकराव आम होते जा रहे हैं।
बाघ और अन्य जंगली जानवर अपने प्राकृतिक निवास से बाहर निकलकर गाँवों तक पहुँच रहे हैं।
ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए वन विभाग को और सख़्त रणनीति बनानी होगी।
ऐसी घटनाओं से बचने के लिए लोगों को भी सावधानी बरतनी होगी।
सीतापुर में बाघिन को पकड़ने की इस सफलता ने ग्रामीणों को राहत दी है, लेकिन यह घटना चेतावनी भी है कि जब तक जंगलों और वन्यजीवों के संरक्षण पर गंभीरता से काम नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियाँ सामने आती रहेंगी। बाघिन की गिरफ्तारी ने फिलहाल चार साल से चले आ रहे खौफ़ का अंत किया है, लेकिन इंसान और जंगली जीवन के बीच संतुलन बनाने के लिए सतत प्रयास करना ज़रूरी है।
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