Pitru Paksh 2025: सीता माता ने पुष्कर तीर्थ में श्राद्ध भोज में क्यों लिया एकांत? जानिए श्री राम और दशरथ पितृ से जुड़ी यह अद्भुत कथा
Pitru Paksh 2025: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवधि में लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हैं और श्राद्ध कर्म के माध्यम से उन्हें तृप्त करने का प्रयास करते हैं। शास्त्रों में यह उल्लेख मिलता है कि ब्राह्मणों और ऋषियों को भोजन कराने से पितृ तृप्त होते हैं। लेकिन क्या वास्तव में पितृ श्राद्ध में उपस्थित होकर भोजन ग्रहण करते हैं? इस रहस्य को स्पष्ट करने के लिए एक रोचक कथा मिलती है, जो भगवान श्रीकृष्ण और गरुड़ संवाद में वर्णित है।
पढ़िए गरुड़ का प्रश्न और श्रीकृष्ण का उत्तर
पक्षीराज गरुड़ ने श्रीकृष्ण से जिज्ञासा प्रकट की—”हे प्रभु! पृथ्वी पर लोग श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और मानते हैं कि पितृ जन उस अन्न को स्वीकार करते हैं। किंतु क्या वास्तव में किसी ने पितरों को इस प्रकार भोजन करते हुए देखा है?”
इस प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने एक घटना सुनाई, जिसमें माता सीता ने पुष्कर तीर्थ में श्राद्ध भोज के दौरान अपने ससुर महाराज दशरथ सहित पितरों को प्रत्यक्ष रूप से देखा था।
श्री राम और सीता की पुष्कर यात्रा
वनवास के दौरान जब श्रीराम और सीता माता पुष्कर तीर्थ पहुँचे, तब श्राद्ध का अवसर था। श्रीराम ने निश्चय किया कि अपने पिताश्री दशरथ का श्राद्ध यहीं पर संपन्न करें। श्रीराम ने स्वयं श्राद्ध के लिए फल, कंद-मूल और आवश्यक सामग्री एकत्र की और सीता माता ने भक्तिभाव से भोजन तैयार किया।
श्राद्ध कर्म हेतु ऋषियों और ब्राह्मणों को आमंत्रित किया गया। जैसे ही कुतुप मुहूर्त आया, सभी ब्राह्मण और ऋषि पंक्ति में बैठकर भोजन करने लगे।
सीता का अचानक उठ जाना किस बात का था संकेत
जब सीता माता ने बड़े ही श्रद्धाभाव से भोजन परोसना प्रारंभ किया, तभी अचानक वे पंक्ति के मध्य से उठकर एकांत में चली गईं। यह देखकर श्रीराम आश्चर्यचकित हुए। उन्हें लगा कि शायद सीता लज्जा के कारण ब्राह्मणों के सामने से हट गई होंगी।
लेकिन जब भोज समाप्त हुआ और ब्राह्मण चले गए, तब श्रीराम ने सीता से इसका कारण पूछा।
सीता माता ने जो देखा उन्हें बताया
आँखों में आँसू लिए सीता माता बोलीं—”नाथ! जब मैं ब्राह्मणों को भोजन परोस रही थी, तभी उनके मध्य मैंने दो दिव्य पुरुषों को देखा, जो राजा के समान प्रतीत हो रहे थे। तभी मैंने आपके पिताश्री महाराज दशरथ के भी दर्शन किए। वे राजसी वस्त्र और आभूषणों से सुसज्जित थे।
उन्हें उस रूप में देखकर मुझे गहन लज्जा हुई। आज मैं वनवासी जीवन जी रही हूँ, छाल और साधारण वस्त्रों में हूँ। ऐसी अवस्था में मैं उनके सामने कैसे जाती? मिट्टी और पत्तों के पात्रों में रखा साधारण भोजन मैं उन्हें कैसे परोस सकती थी, जबकि वे स्वयं राजसी वैभव के अधिकारी रहे हैं?”
सीता ने आगे कहा—”मुझे भय था कि कहीं वे क्षुब्ध न हो जाएँ और मैं उनका दुःख सह न पाऊँ। इसलिए मैं किसी की दृष्टि से बचते हुए लताओं की ओट में जाकर बैठ गई।”
श्रीकृष्ण ने किया रहस्योद्घाटन
इस कथा को सुनाते हुए श्रीकृष्ण ने गरुड़ से कहा—”हे गरुड़! इस घटना से यह सिद्ध होता है कि पितृगण श्राद्ध में साक्षात उपस्थित होते हैं। वे भोजन करने वाले ब्राह्मणों के रूप में वहाँ विद्यमान रहते हैं।”
कथा से मिलने वाली सीख
यह प्रसंग हमें बताता है कि श्राद्ध कर्म केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि श्रद्धा और भावनाओं से जुड़ा एक आध्यात्मिक अनुष्ठान है। पितृ लोक से आत्मा अपने वंशजों के श्राद्ध में आती हैं और उन्हें तृप्त करती हैं। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि श्राद्ध सदैव पूर्ण श्रद्धा, नियम और शुचिता से करना चाहिए।