शरद पूर्णिमा पर जानिए गोपेश्वर महादेव की दिव्य कथा: जब भगवान शिव बने थे गोपी – फिर आगे जरूर पढ़िए
शरद पूर्णिमा की रात्रि को समर्पित है दिव्य महारास लीला, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजभूमि में रचकर सम्पूर्ण सृष्टि को भक्ति और प्रेम का संदेश दिया। कहा जाता है कि उस रात चाँद अपनी सम्पूर्ण कला में था और अमृत बरस रहा था। उसी दिव्य बेला में भगवान शिव भी श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति में आकंठ डूबे हुए ब्रजधाम पहुंचे, और इसी से उत्पन्न हुई गोपेश्वर महादेव की अद्भुत कथा, जो आज भी वृंदावन के प्रत्येक भक्त के हृदय में श्रद्धा और प्रेम का भाव जगाती है।
भगवान शिव — सबसे बड़े वैष्णव, और भगवान विष्णु — सबसे बड़े शैव
सनातन परंपरा में यह प्रसिद्ध है कि भगवान शिव से बड़ा कोई विष्णु भक्त नहीं और भगवान विष्णु से बड़ा कोई शिव भक्त नहीं। यही कारण है कि दोनों ही एक-दूसरे के परम प्रेमी और आदर्श भक्त माने जाते हैं। इसी भक्ति भावना के कारण जब भगवान शिव को यह समाचार मिला कि श्रीकृष्ण महारास की घोषणा कर चुके हैं, तो उनके हृदय में भी उस दिव्य लीला को देखने और उसमें सम्मिलित होने की तीव्र इच्छा जाग उठी।
महारास की तैयारी और श्री ललिता सखी की भूमिका
जब नौ वर्ष के बालक रूप में श्रीकृष्ण ने महारास का उद्घोष किया, तब पूरे ब्रह्माण्ड में हलचल मच गई। तपस्वी, योगी, मुनि, और सिद्ध आत्मा सभी इस दिव्य रास में सम्मिलित होने की कामना करने लगीं। विभिन्न लोकों से गोपियाँ, जो पूर्व जन्मों में महान ऋषि-मुनि रही थीं, रास स्थल की ओर दौड़ी चली आईं।
महारास में प्रवेश की अनुमति की जिम्मेदारी थी श्रीललिता सखी के हाथों में, जो स्वयं श्री राधा रानी की परम सखी और उनकी स्वरूपा थीं। रास में प्रवेश के लिए स्त्रीत्व अनिवार्य था, और यही नियम भगवान शिव के समक्ष भी आया।
जब भगवान शिव बने गोपी
भगवान शिव जब वृंदावन पहुंचे और रास में सम्मिलित होना चाहा, तब श्रीललिता सखी ने उन्हें रोका और कहा — “हे महादेव, रास में प्रवेश के लिए स्त्री रूप आवश्यक है।” तब भोलेनाथ ने विनम्रता से उत्तर दिया, “तो हमें गोपी बना दीजिए।”
तुरंत श्रीललिता सखी ने भगवान शिव को गोपी स्वरूप में परिवर्तित कर दिया, उनके कानों में श्रीराधा-कृष्ण का युगल मंत्र फूंका और उनका श्रृंगार किया। चूँकि भगवान शिव के सिर पर विशाल जटाजूट और दाढ़ी थी, इसलिए उनके ऊपर बड़ा सा घूँघट डाल दिया गया, ताकि कोई पहचान न सके।
रास स्थल पर भोलेनाथ की लीलामय उपस्थिति
गोपी रूप धारण करने के बाद भी भगवान शिव के विशाल शरीर और तेजस्वी आभा के कारण वे बाकी गोपियों से अलग ही प्रतीत हो रहे थे। हर गोपी आश्चर्यचकित थी कि यह कौन-सी गोपी है, जो इतनी बलिष्ठ और लंबी है। महादेव को लगा कि कहीं श्रीकृष्ण पहचान न लें, इसलिए वे भीड़ के सबसे पीछे जाकर खड़े हो गए।
परंतु सर्वज्ञ भगवान श्रीकृष्ण यह सब भली-भांति जानते थे। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “महारास सबसे पीछे से आरंभ होगा।” यह सुनकर भोलेनाथ घबराकर आगे दौड़े, तो श्रीकृष्ण ने तुरंत कहा, “अब रास आगे से शुरू होगा।” इस प्रकार श्रीकृष्ण और भगवान शिव के बीच यह मनोरम लीला कुछ देर तक चलती रही। सभी गोपियाँ यह देखकर आश्चर्यचकित थीं कि यह रहस्यमयी गोपी बार-बार आगे-पीछे क्यों दौड़ रही है।
जब श्रीकृष्ण ने किया “गोपेश्वर महादेव” का उद्घोष
अंततः श्रीकृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा, “अब महारास इस चंचल गोपी से प्रारंभ होगा जो स्थिर नहीं बैठ रही।” इतना कहकर उन्होंने उस गोपी का घूँघट हटाया और देखा — वो स्वयं भगवान शिव थे।
तभी श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर घोषणा की — “आओ गोपेश्वर महादेव! आपका स्वागत है इस महारास में।”
यह सुनकर सम्पूर्ण ब्रजभूमि आनंद में डूब गई। ऋषि, मुनि और देवता सभी इस दिव्य संगम को देखकर नतमस्तक हो गए। उस क्षण की महिमा का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता।
गोपेश्वर महादेव का मंदिर — वृंदावन की है अमूल्य धरोहर
तब से भगवान शिव गोपेश्वर महादेव के रूप में वृंदावन धाम में साक्षात् निवास करते हैं। आज भी वहां प्रतिदिन सायंकाल उन्हें गोपी रूप में श्रृंगारित किया जाता है और नित्य रास की तैयारी की जाती है। भक्त मानते हैं कि जो भी व्यक्ति गोपेश्वर महादेव के दर्शन करता है और इस कथा का चिंतन करता है, उसके हृदय में श्री कृष्ण भक्ति की गहराई बढ़ती है।
भक्ति — कलयुग में है मोक्ष का सबसे सरल मार्ग
कलियुग में भक्ति ही वह मार्ग है जो मनुष्य को इस लोक में शांति और परलोक में मुक्ति प्रदान करती है। भगवान शिव ने स्वयं यह दिखाया कि सच्ची भक्ति में कोई अहंकार नहीं होता। चाहे वह त्रिलोक अधिपति ही क्यों न हो, जब भक्ति का अवसर आता है तो वह भी प्रेम में लीन होकर भक्त बन जाता है।
इसलिए जब भी आप वृंदावन धाम जाएँ, गोपेश्वर महादेव का दर्शन अवश्य करें। उनके चरणों में नमन करने से न केवल भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में स्थिरता आती है, बल्कि जीवन में प्रेम, शांति और आनंद का संचार भी होता है।