शादी बनी सज़ा!, प्रताड़ित पति ने मांगी इच्छा मृत्यु

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शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।

शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।

शादी बनी सज़ा!, पत्नी का खौफ या कानून की लाचारी? | मुजफ्फरनगर में युवक ने कलेक्ट्रेट में लगाई इच्छा मृत्यु की गुहार | एक बैनर और टूटती उम्मीदों की कहानी 

“जब प्यार की जगह खौफ और जीवनसाथी की जगह ज़िंदगी का बोझ मिल जाए, तो इंसान जीते जी मरने लगता है।”

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक युवक का हाथों में बैनर लेकर कलेक्ट्रेट में इच्छा मृत्यु की मांग करना कोई आम घटना नहीं है। यह उस दर्द की चीख है जिसे समाज ने अनसुना कर दिया, कानून ने उलझा दिया और एक पति को मरने की दुआ मांगने पर मजबूर कर दिया।

शादी बनी सज़ा!, पत्नी के डर से कलेक्ट्रेट पहुंचा पति

शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।
शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।

सोमवार को उस वक्त जिला कलेक्ट्रेट में हड़कंप मच गया जब एक युवक हाथों में एक बड़ा बैनर लेकर प्रशासनिक दफ्तर के सामने बैठ गया। बैनर पर पत्नी की फोटो और बड़े-बड़े शब्दों में लिखा था –

“एक गरीब की गुहार – मुझे मरने की इजाजत दीजिए, मैं अपनी पत्नी से परेशान हूं”

उस युवक का नाम था सुमित सैनी। अपनी टूटी उम्मीदों, शरीर पर लगे जख्म और दिल में छिपी पीड़ा को लेकर वह सीधे अधिकारियों के सामने जा पहुंचा। वहां उसने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को संबोधित ज्ञापन देकर इच्छा मृत्यु की मांग की।

 शादी, प्यार और पिटाई – एक-एक परत को खोलती सच्चाई

सुमित की शादी 1 जुलाई 2024 को जनपद के कुकड़ा गांव में पिंकी नाम की युवती से हिंदू रीति-रिवाज से बिना दहेज के हुई थी। लेकिन यह रिश्ता सिर्फ कागजों में रह गया। सुमित के अनुसार,

“शादी के अगले ही दिन पिंकी ने कह दिया कि वो किसी और से प्यार करती है और यह शादी उसकी मर्जी के खिलाफ हुई है।”

इसके बाद शुरू हुआ रोज़ का कलह, गाली-गलौच और मारपीट

सुमित का दावा है कि पत्नी ने कई बार उसका गला घोंटने की कोशिश की

कई बार वह उसके ऊपर हाथ उठाती थी और दूसरों से पिटवाने की धमकी देती थी।

पिछले छह महीने से वह मायके में रह रही है और वहीं से फोन कर धमकियां देती है।

शादी बनी सज़ा! बेघर, बेबस और बर्बाद – पिता ने संपत्ति से बेदखल किया

जब घर का माहौल सुधरता नहीं दिखा, तो रिश्ते को बचाने की उम्मीद में सुमित के पिता ने उसे संपत्ति से बेदखल कर दिया

“उम्मीद थी कि पत्नी शांति से रहेगी लेकिन उल्टा उसने मेरे पिता को भी धमकाया। वह कहती थी कि अगर हिस्सा नहीं दिया तो जान से मरवा देगी।”

सुमित के अनुसार,

पिता ने ₹8 लाख की संपत्ति से बेदखल कर दिया।

₹5 लाख शादी में खर्च हुए, और

₹3 लाख पत्नी को दिए, जिसे लेकर वह मायके चली गई।

साथ ही कई कीमती सामान भी साथ ले गई।

शादी बनी सज़ा!,कोर्ट का सहारा और झूठे केस का जाल

सुमित ने कोर्ट में HMA सेक्शन 9 के अंतर्गत पत्नी को वापस लाने का नोटिस भेजा, लेकिन जवाब में पत्नी ने छोटे भाई पर छेड़खानी का झूठा आरोप लगा दिया।

“अब ना पत्नी मिल रही है, ना इज्जत बच रही है, ऊपर से धमकियां मिल रही हैं।”

शादी बनी सज़ा!, “मुझे मरने दो” – कलेक्ट्रेट में गूंजती गुहार

सुमित ने कहा –

“मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से निवेदन करता हूं कि मुझे इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जाए। मेरी जिंदगी नर्क बन चुकी है। अब जीना नहीं चाहता।”

“मैं एक गरीब आदमी हूं। मैं अपनी पत्नी से इतना परेशान हूं कि अब मौत ही अंतिम सहारा लगती है। वह मुझसे मारपीट करती है, धमकाती है, और बार-बार झूठे आरोप लगाकर मुझे फंसा रही है। मैंने हर रास्ता आजमा लिया, अब बस मरने की इजाजत चाहिए।”

सवाल जो गूंज रहे हैं:

क्या कोई पति भी उत्पीड़न का शिकार हो सकता है?

क्या कानून की पकड़ सिर्फ पुरुषों के लिए ही बनी है?

क्या झूठे केस और घरेलू हिंसा अब पुरुषों की भी सच्चाई बनती जा रही है?

शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।
शादी बनी सज़ा! मुजफ्फरनगर में प्रताड़ित पति ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर मांगी इच्छा मृत्यु, पत्नी के डर ने तोड़ दिया जीने का हौसला। पढ़िए पूरी दर्द भरी कहानी।

 जनजागरूकता और सोचने का वक्त

इस घटना ने एक नई बहस को जन्म दे दिया है। समाज में जब कोई पुरुष उत्पीड़न की बात करता है, तो उसे अक्सर मजाक समझा जाता है। लेकिन सुमित जैसे कई पुरुष आज भी मानसिक, शारीरिक और सामाजिक हिंसा के शिकार हैं, जिनकी कोई सुनवाई नहीं होती।

“पति की चुप्पी का मतलब सहमति नहीं होती – कई बार वह डर, लाचारी और टूटे भरोसे की आवाज होती है।”

आत्महत्या कोई हल नहीं – समाज को समझना होगा

“कभी-कभी ज़िंदगी इतनी उलझ जाती है कि मौत ही आखिरी रास्ता लगती है। लेकिन सच यह है कि आत्महत्या किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।”

सुमित की तरह कई लोग जब सिस्टम से थक जाते हैं, रिश्तों से हार जाते हैं, और उम्मीदें जवाब दे जाती हैं – तो वे जीवन से मुंह मोड़ लेते हैं। लेकिन यह कदम न केवल स्वयं की जिंदगी खत्म करता है, बल्कि परिवार और समाज को भी गहरे घाव दे जाता है।

हमें समझना होगा कि कानूनी रास्ते, परामर्श, और सामूहिक बातचीत के ज़रिए भी रास्ता निकाला जा सकता है। सरकार को भी चाहिए कि पुरुषों के लिए भी काउंसलिंग और सुरक्षा तंत्र की व्यवस्था सुनिश्चित हो।

समाज को अब सीखना होगा कि हर शोषण पीड़ित की आवाज जरूरी है – चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। और हर ज़िंदगी अनमोल है – उसे खत्म करने की नहीं, बचाने की जरूरत है।

सुमित की कहानी अकेली नहीं है। यह आवाज है उन हजारों पुरुषों की जो दर्द सहकर भी कुछ नहीं कह पाते। शायद वक्त आ गया है कि समाज ‘पुरुषों के अधिकार’ पर भी गंभीर चर्चा करे और मीडिया-सिस्टम-न्याय व्यवस्था सब मिलकर ऐसे मामलों को भी समान दृष्टि से देखे।

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