Rampur सांसद की चौथी पत्नी को गुज़ारा भत्ता देने का आदेश, जानिए एक मां, एक पीड़िता का दर्द
Rampur सांसद मोहिबुल्ला नदवी को चौथी पत्नी को 30,000 रु. मासिक गुज़ारा भत्ता देने का आदेश — रुमाना परवीन की ज़िंदगी में आशा की किरण?
रामपुर के सपा सांसद के खिलाफ पारिवारिक विवाद में अदालत ने 30,000 रु. मासिक गुज़ारा भत्ता देने का निर्देश दिया, साथ ही 55,000 रु. जमा करने और तीन महीने में मध्यस्थता का रास्ता अपनाने के आदेश दिया।
कभी रिश्तों की छाया में दबी हुई एक नाज़ुक धड़कन—आज अदालत की दहलीज़ पर रोशनी बनकर उभरी है। आगरा की एक साधारण सी महिला, जो कभी चुप्पी की जंजीरों में बंधी थी, अब अपने हक़ की लड़ाई में जीत की पहली सीढ़ी पर है। रुमाना परवीन — एक मां, एक पीड़िता, और एक उम्मीद की प्रतीक — जिनकी लंबी कानूनी जंग ने अब उन्हें गुज़ारा भत्ता दिलाने का हक़ दिलाया है। सवाल बस इतना है कि क्या यह फैसला उनके टूटे सपनों को जोड़ पाएगा?
पूरा मामला — दर्द और दस्तावेज़
शादी से अलगाव तक, एक टूटे रिश्ते की कहानी
रुमाना परवीन की शादी 23 अक्टूबर 2012 को मोहिबुल्ला नदवी से हुई थी। रिश्तेदारों द्वारा तय यह विवाह पहले तो सामान्य रहा, लेकिन धीरे-धीरे इसमें तूफ़ान उठने लगा। शादी के कुछ समय बाद रुमाना ने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन, उनका कहना है कि शादी के कुछ वर्षों में ही उत्पीड़न शुरू हो गया।
उन्होंने बताया कि नदवी अक्सर मारपीट करते थे और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे। पहली पत्नी के निधन के बाद उन्होंने कई और शादियाँ कीं, और अंत में रुमाना को भी घर से निकाल दिया। 19 अप्रैल 2015 को उन्हें बहाने से घर से भगा दिया गया और बाद में धमकियाँ भी दी गईं।
कानूनी जंग, गुज़ारा भत्ते की लड़ाई
2015 में रुमाना ने फैमिली कोर्ट में गुज़ारा भत्ता के लिए आवेदन दिया। प्रारंभिक आदेश में उन्हें 4,000 रु. मासिक मिलने लगा, लेकिन बेटे की परवरिश और रोज़मर्रा खर्चों को देखते हुए यह रकम नाकाफी साबित हुई। 2020 में उन्होंने दोबारा आवेदन दिया और भत्ता बढ़ाने की मांग की।
काफी लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत ने अब आदेश दिया है कि नदवी अपनी पत्नी रुमाना को 30,000 रु. मासिक गुज़ारा भत्ता दें और 55,000 रु. एकमुश्त जमा करें। साथ ही अदालत ने दोनों पक्षों को तीन महीने के भीतर मध्यस्थता से समाधान का रास्ता खोजने का निर्देश दिया है।
रुमाना की आवाज — उम्मीद की लौ
रुमाना परवीन का कहना है — “मेरी ज़िंदगी और मेरे बेटे की जिंदगी बर्बाद कर दी गई। हमें न्याय चाहिए। हर बार झूठे वादे किए गए, धमकियाँ दी गईं। यह आदेश मेरी जिंदगी बदल सकता है।”
उनके शब्दों में एक ऐसी स्त्री की पीड़ा झलकती है जिसने समाज और सत्ता दोनों से लड़कर अपने अस्तित्व को साबित किया है।
राजनीति और परिवार — एक जटिल टकराव
मोहिबुल्ला नदवी एक सार्वजनिक व्यक्ति हैं, और जब एक जनप्रतिनिधि पर इस तरह का पारिवारिक विवाद सामने आता है, तो यह केवल निजी नहीं रहता — यह सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। सत्ता, प्रतिष्ठा और परिवार — तीनों के बीच उलझा यह मामला समाज को एक आईना दिखाता है कि जब जिम्मेदारी और संवेदना के बीच दीवार खड़ी हो जाती है, तो परिवार का संतुलन कैसे टूट जाता है।
Rampur घटना की टाइमलाइन
23 अक्टूबर 2012: शादी हुई।
2015: रुमाना ने गुज़ारा भत्ते के लिए आवेदन दिया, प्रारंभिक आदेश में ₹4,000 मासिक तय।
19 अप्रैल 2015: रुमाना को घर से निकाले जाने का आरोप।
2020: दोबारा गुज़ारा भत्ता बढ़ाने के लिए आवेदन।
2024: अदालत ने गुज़ारा भत्ता बढ़ाने के आदेश दिए।
2025: अदालत ने मासिक ₹30,000 देने का अंतरिम आदेश जारी किया, साथ ही मध्यस्थता का रास्ता सुझाया।
रुमाना परवीन की यह जीत केवल एक कोर्ट का आदेश नहीं, बल्कि समाज में उन हजारों महिलाओं की उम्मीद है जो वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा में हैं। यह फैसला यह साबित करता है कि सच्चाई चाहे जितनी देर से क्यों न बोले, पर जब बोलती है — तो झकझोर देती है।