Pitru Paksh 2025: गया जी में क्यों किया जाता है पिंडदान? जानिए क्यों कहलाती है मोक्ष नगरी और कैसे मिला ये नाम

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Pitru Paksh 2025: बिहार राज्य में स्थित गया एक प्राचीन और पवित्र नगरी है, जिसे मोक्ष की नगरी कहा जाता है। हर वर्ष पितृ पक्ष के दौरान हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान एवं श्राद्ध कर्मकांड करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष प्राप्त होता है और पितृ दोष दूर हो जाता है। लेकिन प्रश्न यह उठता है कि आखिर गया को मोक्ष नगरी क्यों कहा जाता है और यहां पिंडदान का इतना महत्व क्यों है? इसका उत्तर हमें मिलता है एक पौराणिक कथा से, जो गयासुर नामक राक्षस से जुड़ी है।

गयासुर का तप और वरदान

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, गयासुर एक अत्यंत तपस्वी और धार्मिक प्रवृत्ति का राक्षस था। उसने कठोर तपस्या करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। जब भगवान विष्णु प्रकट हुए तो उन्होंने गयासुर को वरदान मांगने के लिए कहा। गयासुर ने जो वरदान मांगा, वह अद्वितीय था।

उसने कहा—”जो भी मेरे शरीर का स्पर्श करेगा, उसे सीधे स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी।” भगवान विष्णु ने उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर यह वरदान दे दिया। इसके बाद स्थिति यह हुई कि गयासुर के स्पर्श से पापी और पुण्यात्मा, दोनों ही सीधे स्वर्ग लोक जाने लगे।

जब यमलोक हो गया खाली

समय बीतने के साथ ही यमलोक लगभग खाली हो गया और संसार में पाप-पुण्य का संतुलन बिगड़ने लगा। देवताओं ने जब यह समस्या देखी तो वे चिंतित हो गए। तब सभी देवी-देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे। ब्रह्मा जी ने समाधान खोजते हुए गयासुर से यज्ञ के लिए उसका पवित्र शरीर मांग लिया।

गयासुर ने भी बिना किसी संकोच के अपनी देह यज्ञ हेतु दान कर दी। ब्रह्मा जी ने उसके शरीर पर धर्मशिला रखकर यज्ञ आरंभ किया, किंतु गयासुर का शरीर इतना पवित्र था कि वह लगातार हिलता-डुलता रहा।

गदाधर रूप में प्रकट हुए भगवान विष्णु 

तब गयासुर के शरीर को स्थिर करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु गदाधर रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अपने दाहिने पैर से गयासुर के शरीर को दबाया और उसे स्थिर कर दिया। इस समय गयासुर ने भगवान विष्णु से एक विशेष प्रार्थना की।

उसने कहा कि जिस स्थान पर वह अपने प्राण त्यागे, वही स्थल एक पवित्र शिला में परिवर्तित हो जाए और वह स्वयं उसमें सदैव विद्यमान रहे। साथ ही, उस शिला पर भगवान विष्णु के चरण चिन्ह भी स्थायी रूप से बने रहें।

इस तरह विष्णुपद मंदिर से पड़ा गया का नाम

भगवान विष्णु ने गयासुर की प्रार्थना स्वीकार कर ली। आज भी गया के प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरण चिन्ह मौजूद हैं। श्रद्धालु वहां जाकर चरणों के दर्शन करते हैं और पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। इसी घटना के कारण इस स्थान का नाम ‘गया’ पड़ा और यह क्षेत्र गदाधर क्षेत्र के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। तभी से गया पितृ कर्मकांड और श्राद्ध का प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया।

 

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