Pilibhit की गौशालाओं से New India @2047 को नया आयाम, Samarth UP की दिशा में मजबूत कदम
New India @2047: पीलीभीत जिलाधिकारी ने गौशाला का निरीक्षण कर दिया संदेश, गोबर से भी आत्मनिर्भर बनेगा भारत
पीलीभीत के जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह ने आज देवीपुरा गौशाला का औचक निरीक्षण कर व्यवस्थाओं की गहन समीक्षा की। उन्होंने भूसा, हरा चारा, पानी और साफ-सफाई की स्थिति को परखा तथा गौशाला समिति को गोवंशों की नियमित देखभाल के लियर खास जो दिया। जिलाधिकारी का संदेश साफ था — गौशालाओं को केवल आश्रय स्थल नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता का केंद्र बनाना है। इसी दिशा में गौशाला से निकलने वाला “गोबर” एक बड़ा आर्थिक साधन साबित हो सकता है, जो “आत्मनिर्भर भारत” और “विकसित भारत मिशन 2047” की राह को मजबूत करेगा।
जानिये गोबर से बनने वाले प्रमुख उत्पाद
गाय के गोबर से तैयार होने वाले उत्पादों की विविधता बहुत अधिक है और प्रत्येक उत्पाद का अपना उपयोग व बाजार है। सबसे पहले गोबर से तैयार जैविक खाद आती है — खुले में सड़ाकर, कम्पोस्टिंग या वर्मी-कम्पोस्ट प्रक्रिया से गोबर को उच्च गुणवत्ता वाली खाद में बदला जाता है। इस खाद के प्रयोग से मिट्टी की जलधारण क्षमता, सूक्ष्म पोषक तत्व और जीवन्त सूक्ष्मजीव बढ़ते हैं, इससे रासायनिक खादों की निर्भरता घटती है और फसलों की उपज पर सकारात्मक असर पड़ता है। छोटे किसान और स्वयं सहायता समूह इस कृषि-खाद को पैक कर स्थानीय बाजार में बेचकर स्थिर आय अर्जित कर सकते हैं।
दूसरा बड़ा श्रेणी बायोगैस और Bio-CNG है। गोबर और अन्य कार्बनिक अपशिष्टों को बायो-डाइजेस्टर में डाला जाता है जहाँ सूक्ष्मजीव गोबर को अपघटित कर बायोगैस उत्पन्न करते हैं। यह गैस रसोई गैस के विकल्प के रूप में, छोटे उद्योगों में ईंधन के रूप में और यदि संयंत्र बड़ा हो तो वाहन ईंधन Bio-CNG के रूप में भी उपयोग हो सकती है। बायोगैस स्पेसिफिकेशन के अनुसार उपयुक्त संयंत्र लगाने पर ग्रामीण घरों की ऊर्जा आवश्यकताएँ सस्ती और स्वच्छ तरीके से पूरी की जा सकती हैं।
गोबर से बने हस्त-शिल्प और पूजा-सामग्री भी आज बाजार में मांग में हैं। पारंपरिक और इको-फ्रेंडली उत्पाद — जैसे मिट्टी-गोबर के दीपक, मूर्तियाँ, सजावटी वस्तुएँ — स्थानीय कला को जोड़कर महिलाओं और युवाओं के लिये स्वरोजगार के अवसर देते हैं। इसी प्रकार गोबर से बने उपले/बायो-ब्रिकेट्स ईंधन के विकल्प के रूप में उपयोगी हैं, वे ठोस ईंधन के रूप में सस्ते व पर्यावरण-हितैषी विकल्प पेश करते हैं।
एक और क्षेत्र निर्माण सामग्री का है — गोबर मिश्रित ईंटें, गोबर-प्लास्टर और गोबर-आधारित पेंट इको-निर्माण में उपयोगी हैं। इन सामग्रियों से घरों और गौशालाओं में प्राकृतिक इंसुलेशन, नमी-नियंत्रण और कम लागत वाले निर्माण संभव हैं। अन्त में पंचगव्य व पारम्परिक औषधीय उपयोग आते हैं — पंचगव्य में गोबर, गोमूत्र, घी आदि मिलाकर कृषि व पौधों के उपचार में उपयोग किया जाता है। यह जैविक खेती में सहायक माना जाता है। इन सभी उत्पादों के संयोजन से गौशाला और ग्रामीण उद्यमियों के लिए कई स्तरों पर आय सृजन के मार्ग खुलते हैं।
New India @2047: केंद्र सरकार की पहल, GOBAR-DHAN योजना
केंद्र सरकार की GOBAR-DHAN जैसी पहलों का उद्देश्य गोबर और जैविक अपशिष्ट को कचरे से संसाधन में बदलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाना है। इस मॉडल में पंचायत-स्तर पर गोबर संग्रहण पॉइंट बनाए जाते हैं, जहाँ छोटे-छोटे कलेक्शन-सेंटर स्थापित कर गोबर एकत्र किया जाता है। इसके बाद क्लस्टर-आधारित प्रोसेसिंग यूनिटों में इसे कम्पोस्ट, बायोगैस, या ब्रिकेट्स में बदला जाता है। योजना का एक बड़ा लाभ यह है कि स्थानीय स्वयं सहायता समूह (SHGs), गौशाला समितियाँ और युवा उद्यमियों को प्रशिक्षण, मशीनरी एवं प्रारम्भिक वित्त पोषण के माध्यम से स्वरोजगार के अवसर दिए जाते हैं।
GOBAR-DHAN योजना के अंतर्गत ऊर्जा-उत्पादन, जैविक खाद का निर्माण और क्रियात्मक कचरा प्रबंधन को एक साथ जोड़ा जाता है। इससे स्वच्छता भी सुनिश्चित होती है और ग्राम स्तरीय क्लीन-एन्ड-ग्रीन पहल को बल मिलता है। योजना में सरकार और स्थानीय निकायों के साझेदारी मॉडल, बैंकिंग और को-ऑपरेटिव के माध्यम से वित्तीय मदद और मार्केट लिंकेज प्रदान करने पर भी जोर रहता है। इस प्रकार की केंद्र व राज्य स्तर की योजनाएँ गौशालाओं को आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत मिशन 2047 में योगदान
गोबर आधारित अर्थव्यवस्था का प्रभाव केवल स्थानीय आय तक सीमित नहीं रहेगा। इसका दायरा राष्ट्रीय विकास लक्ष्यों तक विस्तृत होता है। जब गाँवों में गोबर से बने उत्पाद जैसे जैविक खाद, बायोगैस और निर्माण सामग्री का उत्पादन और विक्रय व्यवस्थित होगा, तो ग्रामीण आय में स्थिरता आएगी और युवा पलायन घटेगा। इससे ग्रामीण बाजार सशक्त होंगे और स्थानीय मूल्यचक्र (value chain) विकसित होगा।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह अत्यंत लाभकारी है — गोबर का नियंत्रित उपयोग गंदगी और जल-दूषण घटाएगा, और पारंपरिक जलवायु-हानी (GHG) घटाने के उपायों में योगदान देगा। ऊर्जा सुरक्षा के मामले में बायोगैस-आधारित मॉडल फॉसिल ईंधन पर निर्भरता घटा कर स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराएगा। स्वास्थ्य व सार्वजनिक कल्याण के लिहाज से जैविक खाद का प्रयोग खाद्य सुरक्षा व कृषिगत स्वास्थ्य को बेहतर करेगा।
राष्ट्रीय स्तर पर, यदि इन क्लस्टरों को तकनीकी एवं वित्तीय सहायता दी जाए और निर्यात योग्य नीतियाँ बनाई जाएँ, तो गोबर-उत्पाद निर्यात से भी अर्थतंत्र को लाभ होगा। इस तरीके से गोबर आधारित मॉडल “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्यों को सुदृढ़ करते हुए 2047 के विकसित भारत के विजन में ठोस योगदान दे सकता है।
New India @2047: गौशाला निरीक्षण के पीछे जिलाधिकारी की मंशा
निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी ने स्पष्ट कहा कि गौशालाओं को केवल पशु आश्रय के रूप में न देखा जाए, बल्कि उन्हें आर्थिक इकाई के रूप में विकसित किया जाए। उन्होंने गौशाला में उपलब्ध संसाधनों और मशीनरी का ब्यौरा लिया — जैसे सूचना के अनुसार वहां 05 ठेली, 03 पशु लिफ्टिंग मशीन व 01 जाल उपलब्ध कराया गया है — और इन्हें उत्पादकता बढ़ाने एवं घायल पशुओं के सुरक्षित उत्थान/परिवहन में उपयोग करने के निर्देश दिए। जिलाधिकारी ने भूसे की उपलब्धता, नियमित हरा चारा देने और पानी की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
साथ ही, उन्होंने कहा कि गौशाला में आने वाले दुर्घटनाग्रस्त या चोटिल पशुओं का विशेष चिकित्सा ध्यान रखा जाए और प्राथमिक उपचार तथा आवश्यक दवाई समय पर दी जाए। जिलाधिकारी ने कृत्रिम गर्भाधान व ईयर-टैगिंग जैसी वैज्ञानिक पद्धतियों की जानकारी ली और इन्हें नियमित कर पालन-प्रजनन में सुधार लाने के निर्देश दिए। वे चाहते हैं कि गौशाला समितियाँ गोबर से जैविक खाद, बायोगैस और अन्य उत्पाद बनाने के लिए सक्रिय कदम उठाएं तथा इन उत्पादों को स्थानीय बाजारों से जोड़ने का अभियान चलाएँ, ताकि गौशाला और आसपास के किसान दोनों आर्थिक रूप से सशक्त हों।
चुनौतियाँ और समाधान
गोबर पर आधारित अर्थव्यवस्था को सफल बनाने के लिये कुछ ठोस चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, पर उनके व्यावहारिक समाधान भी उपलब्ध हैं। सबसे पहली चुनौती है गोबर का प्रभावी संग्रहण और परिवहन — इससे बचने के लिये ग्राम-स्तर पर संग्रह केन्द्र, क्लस्टर-आधारित कलेक्शन पॉइंट और संगठित ढुलाई व्यवस्था की आवश्यकता होगी। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिये कम्पोस्टिंग मानक, लेबलिंग और परीक्षण लैब्स स्थापित किए जाने चाहिये ताकि उत्पादों का भरोसा बाजार में बने।
बाजार उपलब्ध कराना व मूल्य निर्धारण भी एक बड़ी समस्या है। इसका समाधान सहकारी मॉडल, स्थानीय स्टार्ट-अप्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म से हो सकता है। तकनीकी दक्षता बढ़ाने के लिये प्रशिक्षण केंद्र, जिलास्तरीय कार्यशालाएँ और कृषि विश्वविद्यालयों के सहयोग से स्थानीय उद्यमियों व गौशाला कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। वित्तीय बाधाओं को दूर करने के लिये सूक्ष्म वित्त, सब्सिडी और बैंक-लिंकदन की व्यवस्था जरूरी है।
स्वास्थ्य व जैव-सुरक्षा के लिये नियमित टीकाकरण, चिकित्सा शिविर और पशुचिकित्सकीय सेवाओं को मजबूत करना होगा ताकि फल-दायक व टिकाऊ मॉडल बन सके। प्रशासन-निजी भागीदारी (PPP) के माध्यम से परिचालन लागत घटाने और तकनीक लाने में भी मदद मिल सकती है। इन उपायों से चुनौतियाँ नियंत्रित की जा सकती हैं और गोबर-आधारित उद्योग को स्थायी रूप से चलाया जा सकेगा।
गोबर बनेगा ग्रामीण समृद्धि का आधार
देवीपुरा गौशाला के निरीक्षण ने स्पष्ट कर दिया कि यदि प्रशासन, गौशाला समितियाँ और स्थानीय युवा मिलकर काम करें तो गोबर सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि गांवों की अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ बन सकता है। गोबर से बने उत्पाद न केवल पर्यावरण की बेहतरी में मदद करेंगे बल्कि रोजगार, ऊर्जा सुरक्षा और कृषि-उत्पादों की गुणवत्ता में भी सुधार लाएंगे। प्रशासन की मंशा अनुसार, यदि इन पहलों को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाए — संग्रहण, प्रोसेसिंग, प्रशिक्षण, वित्त एवं बाजार-कनेक्टिविटी के साथ — तो पीलीभीत एक मॉडल जिला बन सकता है जो विकसित भारत-2047 और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों में सार्थक योगदान देगा।
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