Navratri Special: अद्भुत है रजरप्पा स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर: जानिए क्यों आस्था, इतिहास और रहस्यों से भरा है शक्तिपीठ

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Navratri Special: झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर रजरप्पा में मां छिन्नमस्तिका का भव्य मंदिर स्थित है। भैरवी और दामोदर नदी के संगम पर बसा यह मंदिर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ अपने रहस्यमय चमत्कारों के लिए भी प्रसिद्ध है। इस मंदिर को असम के कामाख्या मंदिर के बाद दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ माना जाता है, जहां देश और विदेश से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं।

मंदिर की ख़ास है विशेषता और महत्व

मां छिन्नमस्तिका मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां स्थापित मूर्ति के गले से दोनों ओर से रक्त धारा प्रवाहित होती दिखाई देती है। यही कारण है कि यह शक्तिपीठ अद्वितीय और अलौकिक माना जाता है। मूर्ति के पैरों के नीचे कामदेव और रति लेटे हुए दर्शाए गए हैं, जबकि देवी की दोनों ओर उनकी सहेलियां जया और विजया दिखाई देती हैं। यह दृश्य न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि तांत्रिक साधना का भी प्रमुख केंद्र है।

यहां पर बलि प्रथा भी प्रचलित है। बलि के दौरान सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि जिस स्थान पर बकरे की बलि दी जाती है, वहां पर रक्त गिरने के बावजूद एक भी मक्खी नहीं भटकती। यह रहस्य मंदिर को और भी चमत्कारिक बना देता है।

जानिए मंदिर परिसर और अन्य आकर्षण

रजरप्पा का यह सिद्ध पीठ सिर्फ छिन्नमस्तिका माता के मंदिर तक सीमित नहीं है। यहां पर महाकाली मंदिर, सूर्य मंदिर, दस महाविद्या मंदिर, बजरंग बली मंदिर, शंकर मंदिर और विराट रूप मंदिर जैसे अनेक धार्मिक स्थल मौजूद हैं। संगम स्थल के पास ही दो गर्म जलकुंड हैं। मान्यता है कि इन कुंडों में स्नान करने से चर्म रोग समेत कई गंभीर बीमारियां दूर हो जाती हैं। यही कारण है कि श्रद्धालुओं के साथ-साथ शोधकर्ताओं की भी यहां विशेष रुचि बनी रहती है।

पढ़िए छिन्नमस्तिका माता की उत्पत्ति की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवती भवानी अपनी सहेलियों जया और विजया के साथ मंदाकिनी नदी में स्नान करने गईं। स्नान के बाद देवी और उनकी सहेलियों को तीव्र भूख लगी। सहेलियों ने भोजन की मांग की लेकिन जब तत्काल भोजन उपलब्ध नहीं हो सका, तो भवानी ने अपने खड्ग से स्वयं का सिर काटकर सहेलियों को रक्त की धाराओं से तृप्त किया।

उस समय देवी की तीन रक्त धारा प्रवाहित हुईं—दोनों सहेलियों के लिए और एक स्वयं देवी के लिए। तभी से उन्हें छिन्नमस्तिका कहा जाने लगा। इस अद्वितीय स्वरूप में मां शक्ति के त्याग और करुणा का अद्भुत संदेश मिलता है।

माना जाता है तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र

मां छिन्नमस्तिका का यह मंदिर तांत्रिक साधना के लिए भी विख्यात है। असम में कामाख्या और पश्चिम बंगाल में तारा पीठ के बाद यह शक्तिपीठ तांत्रिकों का प्रमुख स्थल माना जाता है। नवरात्रि और अमावस्या की रात को यहां देश-विदेश से साधक तंत्र साधना के लिए आते हैं और देवी की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

धार्मिक हैं मान्यताएं और चमत्कार

भक्तों का विश्वास है कि मां छिन्नमस्तिका के दर्शन मात्र से ही सभी कष्टों का निवारण होता है। यहां पर आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं मांगते हैं और पूर्ण होने पर पुनः आभार व्यक्त करने के लिए लौटते हैं। साथ ही, बलि के बाद पुजारी सिर अपने पास रख लेते हैं जबकि शेष भाग दानकर्ता को लौटा दिया जाता है।

सबसे रोचक बात यह है कि रक्त बहने के बावजूद बलि स्थल पर मक्खियों का न होना आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बना हुआ है। यही चमत्कार मंदिर को और भी रहस्यमयी और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना देता है।

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