भोजपुरी सिनेमा की अनमोल धरोहर — मनोज भावुक की ‘Bhojpuri Cinema के संसार’ का आरा में भव्य विमोचन
Bhojpuri Cinema का इतिहास अब किताब की शक्ल में— जब हर किरदार, हर गीत, हर फिल्म की कहानी एक ही लेख में समा जाए, तो यही होता है ‘भोजपुरी सिनेमा जगत’ का असली जादू!”
आरा के वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय में गुरुवार को ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। भोजपुरी सिनेमा के इतिहास पर तीन दशकों से शोध कर रहे सुप्रसिद्ध साहित्यकार और सिनेमा विशेषज्ञ मनोज भावुक की पुस्तक ‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ का लोकार्पण हुआ। यह पुस्तक केवल एक स्मारक ग्रन्थ नहीं, बल्कि भोजपुरी सिनेमा के गौरवशाली अतीत, वर्तमान और भविष्य का विस्तृत दस्तावेज़ है।
विश्वविद्यालय में समारोह — साहित्य और सिनेमा का समागम
दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह ‘नाथ’ सभागार में आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत संयुक्त दीप प्रज्वलन से हुई। वर्तमान विभागाध्यक्ष प्रो. दिवाकर पांडेय ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि यह पुस्तक शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों के लिए आधार ग्रंथ का कार्य करेगी।
पूर्व विभागाध्यक्षों प्रो. रविंद्र नाथ राय, प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय, प्रो. डॉ. नीरज सिंह और वरिष्ठ आलोचक जितेंद्र कुमार ने पुस्तक का लोकार्पण कर इसकी महत्ता पर प्रकाश डाला।
साहित्यकार मनोज भावुक की मंशा
मनोज भावुक ने अपने वक्तव्य में कहा —
“भोजपुरी केवल भाषा नहीं, यह संस्कृति है, यह पहचान है। हमारा कर्तव्य है कि युवा पीढ़ी को इसकी समृद्ध परंपरा से परिचित कराएँ। इस पुस्तक का उद्देश्य भोजपुरी सिनेमा के इतिहास को संजोना और इसे नए सिरे से युवा पीढ़ी तक पहुँचाना है।”
उन्होंने विद्यार्थियों को सृजनशील बनने की प्रेरणा देते हुए स्वरचित गीत और गजलें भी प्रस्तुत कीं। उनका कहना था कि भोजपुरी अब ग्लोबल भाषा बन चुकी है और इसकी पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करना हमारी जिम्मेदारी है।
पुस्तक की विशेषताएँ — भोजपुरी सिनेमा का समग्र दर्शन
पुस्तक में वर्ष 1931 से अब तक के भोजपुरी सिनेमा की यात्रा का विस्तार से वर्णन है।
1962 में बनी पहली भोजपुरी फ़िल्म ‘गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो’ से पहले हिंदी सिनेमा में भोजपुरी की झलक और गीतों की भूमिका को रोचक किस्सों के साथ दर्ज किया गया है।
फिल्म हस्तियों जैसे अमिताभ बच्चन, सुजीत कुमार, राकेश पांडेय, कुणाल सिंह, रवि किशन और मनोज तिवारी के साक्षात्कार शामिल हैं।
पुस्तक में भोजपुरी सिनेमा की चुनौतियाँ, संभावनाएँ, व्यवसायिक दृष्टि और भविष्य का विश्लेषण भी किया गया है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म, भोजपुरी वेबसीरीज, टेलीफिल्म और सीरियल्स पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है।
भोजपुरी साहित्य और सिनेमा में मनोज भावुक की खास पहचान
मनोज भावुक केवल लेखक नहीं, बल्कि भोजपुरी सिनेमा और साहित्य के बीच की मजबूत कड़ी हैं। वे दोनों को समझते हैं, जानते हैं और काम करते हैं। हाल ही में उनकी फिल्म ‘आपन कहाये वाला के बा’ रिलीज़ हुई, जिसमें उनके द्वारा लिखे गीतों ने पुराने दौर के शैलेंद्र, मजरूह सुल्तानपुरी और अंजान की याद ताजा कर दी।
उनका योगदान केवल लेखन तक सीमित नहीं है — अफ्रीका और इंग्लैंड में इंजीनियरिंग के बाद भी उन्होंने सारेगामा-पा जैसे प्रतिष्ठित प्रोजेक्ट्स में नेतृत्व किया। फिल्मफेयर और फेमिना जैसी संस्थाओं ने उन्हें भोजपुरी आइकॉन अवार्ड से नवाजा गया ।
मनोज भावुक की अंतरराष्ट्रीय पहचान
मनोज भावुक की डॉक्यूमेंट्री और भोजपुरी सिनेमा पर आधारित कार्यक्रम मॉरिशस, दिल्ली, जेएनयू, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय सहित विश्व स्तर पर प्रदर्शित किए गए हैं।
कुणाल सिंह जैसे सिने स्टार उन्हें ‘भोजपुरी सिनेमा का इनसाइक्लोपीडिया’ कहते हैं।
पुस्तक का महत्व — शोध और शिक्षा के लिए आधार ग्रंथ
यह पुस्तक मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई है।
यह शोध और शिक्षा के क्षेत्र में भी आधार ग्रंथ साबित होगी।
विद्यार्थी और शोधकर्ता इसे अपनी रिसर्च और परियोजनाओं में संदर्भ के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं।
समाज और संस्कृति पर असर
‘भोजपुरी सिनेमा के संसार’ केवल फिल्म की कहानी नहीं बताती, बल्कि भोजपुरी भाषा, संस्कृति और परंपरा को संरक्षित करने का संदेश देती है।
यह ग्रंथ नई पीढ़ी को प्रेरित करता है कि वे भोजपुरी में लेखन करें, संगीत और सिनेमा में सक्रिय रहें और इस भाषा की वैश्विक पहचान को और मजबूत करें।
भोजपुरिया गर्व का प्रतीक
इस लोकार्पण कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शोधार्थी, छात्र-छात्राएं, मीडियाकर्मी और भोजपुरी प्रेमी उपस्थित रहे।
प्रो. अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की, जबकि प्रो. दिवाकर पांडेय ने सफल संचालन किया।
इस पुस्तक ने यह साबित कर दिया कि भोजपुरी सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि हमारी पहचान, गौरव और सांस्कृतिक धरोहर है।