Pilibhit के सखिया गांव का काला सच उजागर, प्रशासन बड़ी कार्रवाई करने वाला है

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Pilibhit के सखिया गांव का काला सच उजागर, प्रशासन बड़ी कार्रवाई करने वाला है। गांव के हालात और प्रशासन की कार्रवाई की पूरी जानकारी पढ़ें।

Pilibhit का सखिया गांव: चमत्कारऔर अन्धविश्वास की आड़ में चल रहा था लाखों की लूट का खेल —आस्था के नकाब में छुपे काले चेहरे बेनकाब

पहली नजर में अद्भुत चमत्कार, पर निगाह उठाते ही खटकने वाली सच्चाई: सखिया के उस सौ वर्षीय पीपल के पेड़ के चारों ओर इकट्ठा होती भीड़, हाथ उठाकर होती भक्ति, और चंदे के थैलों में सजते हज़ारों-लाखों रुपये — यही वह तस्वीर है जिसने गाँव की जमीनें छीन लीं, गरीब परिवारों की नींद उड़ा दी और आस्था का मज़ाक बना दिया। भोजपत्रों और मोमबत्तियों के बीच जो खेल चल रहा था, वह मामूली भक्ति नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक शोषण का भयंकर तंत्र निकला — और अब प्रशासन ने उसके विरुद्ध ठोस कदम उठाने का काम करनेवाला है।

आग की तरह फैली खबर, फिर अन्धविश्वास का खेल — और परदे के पीछे चल रही काली कमाई की करतूत 

पहले यह बस मानवीय आस्था का एक छोटा-सा जश्न था। फिर कुछ लोगों के ‘कहने भर’ से यह आस्था सुपरहिट बन गई। जब श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी और हर दिन लाखों के चढ़ावे का दौर शुरू हुआ, तो वही लोग जो पहले ‘भक्तों की सेवा’ का रोना रोते थे, अचानक आनंद के ठेकेदार बन गए। गाँव के लोग बताते हैं कि हर दिन की कमाई की गिनती की जाती — 72 हज़ार का एक दिन का रिकॉर्ड भी सामने आया — तो सवाल यही उठता है, इतनी बड़ी रकम कहाँ जा रही थी? किस खाते में जमा हो रही थी? किसके हवाले हो रही थी? ये सवाल वहीं खड़े हो गए जहाँ आस्था का तिलक लगाए सबसे बड़ा चमकदार दिखा।

छत्रपाल और उसका बेटा — आस्था के चेहरों के पीछे की काली सूरत

गांव के बुज़ुर्गों और विरोधियों का आरोप है कि छत्रपाल और उसका बेटा अजय — यही दो नाम हैं जो सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं — वही लोग हैं जिनके हवाले से चढ़ावे गायब होते दिखे। ग्रामीणों के मुताबिक, विरोध करने पर साधु-संतों को धमकाया गया, भगा दिया गया, और कभी-कभार तो खुलेआम मारपीट तक हुई। यह कोई मामूली विवाद नहीं, बल्कि फिराक-सा खेल है जिसमें हर कदम पर पैसे का हिसाब-नकाब ग़ायब हो जाता था। लोग कह रहे हैं कि जो भी चढ़ावा आता, उसका बड़ा हिस्सा इन्हीं के हाथों में चला जाता — और आरोप लगाया स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता ने इस खेल को पनपने का मौका दिया।

वायरल वीडियो ने खोल दी पोल — सोशल मीडिया पर सब कुछ बेनकाब

जब एक दिन चढ़ावे की गिनती और उसकी बँटवारे की क्लिप सोशल मीडिया पर आई, तो वह एक कड़वा सच था — लाखों रुपये बटोरकर उन्हें जेब में भरते हुए लोगों के वीडियो ने गाँव के छिपे हुए चेहरे सामने ला दिए। जनता के विश्वास को तोड़ने वाली यह क्लिप इतनी स्पष्ट थी कि प्रशासन को सख्त कदम उठाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। वही वीडियो जिसने पहले ‘आस्था’ का परदा गाड़ रखा था, आज वही वीडियो पूरे सच की कलई खोल रहा है।

जूना अखाड़ा की धुआँधार एंट्री — महंत सत्य गिरी ने दी सख्त चेतावनी

जब जूना अखाड़ा के महंत सत्य गिरी अपने साधु-संतों के साथ सखिया पहुँचे, तो माहौल सनसनीखेज हो गया। महंत सत्य गिरी ने न केवल आरोप-प्रत्यारोप लगाए, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह मांग रखी कि मेले की कमेटी बनाकर किसी सक्षम अधिकारी को रिसीवर नियुक्त किया जाए। उनके शब्दों में तीखापन था, “यहां चढ़ावा एक दिन में 72 हजार आया, पर हिसाब कौन दे रहा है? साधु-संतों को मार-पीट कर भगा दिया जाता है — यह धर्म नहीं, अपराध है।” जूना अखाड़े की मौजूदगी ने पूरी घटना को राष्ट्रीय तूल दे दिया — और साथ ही यह संकेत भी कि साधु-संप्रदाय भी अब इस भ्रष्ट खेल के विरोध में खड़े हो सकते हैं।

प्रशासन ने पहले की देरी और अब उठता हंटर — नोटिस, मुकदमे और हड़कंप

महत्वपूर्ण यह है कि जब तक सोशल मीडिया ने मामला उजागर नहीं किया, तब तक प्रशासन की सक्रियता सीमित नजर आई। पर अब कार्रवाई तेज़ी से हो रही है। SDM के आदेश, CO की जांच, और उपजिला मजिस्ट्रेट के नोटिस ने यह संदेश दिया कि अब केवल बातें नहीं, बल्कि क़दम उठाए जाएंगे — 28 लोगों के खिलाफ मुक़दमे की कार्यवाही इसी का पहला संकेत था । इन लोगों को आर्थिक जमानत और मुचलके के साथ क़ानूनी दायरे में बाँधा गया था । यह केवल शुरुआत थी , अगर जांच चढ़ावे और जमीन कब्ज़े के दावों को सही ठहराती है, तो गिरफ़्तारियाँ और परिसंपत्तियों की रिकवरी का रास्ता खुल सकता है।

आस्था के पीछे एक और बड़ा मकसद — जमीन पर कब्ज़ा

पीलीभीत: सखिया गांव में काली कमाई का खेल! “चमत्कारी पेड़” आस्था या अंधविश्वास? वायरल वीडियो ने खोली पोल

गांव के कुछ अनुकरणीय आरोपों के अनुसार, यह पूरा खेल सिर्फ धन इकट्ठा करने का नहीं था — यह जमीन हड़पने की सोची-समझी साजिश भी थी। जो लोग कहते हैं कि कई किसान और छोटे ज़मींदारों की जमीनें इसी भीड़ और गंदगी के कारण बर्बाद हुईं, उनका कहना है कि वही लोग जमीन हड़पने की चाल में लग गए । जब रोज़ाना भारी भीड़ आती है तो खेतों के नासूर की तहह बढ़ती चली गयी, फसलें चौपट हो गयीं हैं — और बाद में विवाद की आड़ में पट्टा-पट्टी की दलीलें सामने आती हैं। यह वही स्टेप है जहां आस्था का नाम आगे बढ़कर भूमाफिया की मदद करता है।

ग्रामीणों की आवाज़ “हमें धोखा मिला — हमारी ज़मीन, हमारा भरोसा और हमारी आज़ादी छीनी गई”

ग्रामीणों आवाज़ें, जो पहले चुप थीं, अब ज़ोर से बोल रही हैं। महिलाओं ने कहा कि उनकी फसलें उजड़ गयीं, बच्चे खेल नहीं पाते, और शांति भंग होने से गांव का सामाजिक ताना-बाना बदल गया। बुज़ुर्गों ने कहा कि यह पीपल का पेड़ दशकों से रहा है, पर अचानक ‘चमत्कार’ का बाजार कैसे खड़ा हो गया — और किसके फ़ायदे के लिए? विरोध करने पर दबाव, धमकियाँ और कभी-कभी मारपीट — यह सब वास्तविक और भयानक दावे हैं जिनका व्यापक सत्यापन होना चाहिए।

सख्त कदम जरूरी — पर क्या प्रशासन जड़ तक जाएगा?

अब सवाल यही है, क्या नोटिस और मुकदमा भरने के बाद प्रशासन उस तह तक उतरेगा जहाँ जमीन के दस्तावेज, चढ़ावे की बँटवारे की रसीदें और वास्तविक आर्थिक हस्तांतरण की छानबीन हो? सिर्फ़ 28 लोगों का पाबंद करना और मुचलके लगाना पर्याप्त नहीं होगा अगर असली संचालक, हुक्मरान और काला धन बाहर आये। सखिया कांड की सच्ची जाँच तब होगी जब बैंक पेमेंट, रसीदें, भूमि दावों और स्थानीय पावर-स्ट्रक्चर की तह तक जा कर जांच की जाएगी।

खतरा टला नहीं — हिंसा की चिंगारी अभी भी मौजूद

स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। जूना अखाड़े के साधु-संतों का डेरा, विरोधियों का आक्रोश और प्रशासनिक दबाव — इन तीनों के बीच कभी भी हवा बदल सकती है। किसानों की जमीनें और गाँव का शांत जीवन इससे और अधिक प्रभावित हो सकता है। अगर प्रशासन असल कार्रवाई नहीं करता, तो यह मामूली विवाद फिर हिंसक टकराव में बदल सकता है — और तब कई परिवारों के जीवन पर स्थायी चोट पहुँच सकती है।

आस्था की आड़ में हुई धोखाधड़ी के खिलाफ अब कोई रियायत नहीं होनी चाहिए

सखिया के पीपल के पेड़ के इर्द-गिर्द उभरा यह विवाद सिर्फ एक स्थानीय मामला नहीं है — यह देश के उन तमाम इलाकों की एक मिसाल है जहाँ आस्था का ढोंग कर जमीन और और करोड़ों का धन हड़पा जा रहा है। अगर सच्चाई से लड़ना है तो प्रशासन को चाहिए कि वह कठोरता से जांच करे, जिम्मेदारों को बेनकाब कर संपत्ति कुर्क करे और पीड़ितों को न्याय दिलाए। वरना यह खेल दूसरी रूप में कहीं और दोहराया जाएगा — और भोली-भाली जनता फिर उसी छल में फंस जाएगी।

पीलीभीत: आस्था या अंधविश्वास? 100 साल पुराना पीपल का पेड़ बना विवाद की जड़, SDM ने कही सख़्त कार्रवाई की बात

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