जानिए ब्रह्मांड बिहारी मंदिर का अद्भुत रहस्य: जहां भगवान कृष्ण को लगता है मिट्टी के पेड़ों का भोग
उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के महावन क्षेत्र में स्थित ब्रह्मांड बिहारी मंदिर आस्था और अद्भुत परंपरा का अनोखा संगम है। यहां भगवान श्रीकृष्ण को किसी माखन-मिसरी या मिठाई का नहीं, बल्कि मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसके पीछे छिपी है भगवान कृष्ण की बचपन की एक अलौकिक लीला—जिसमें उन्होंने अपनी माता यशोदा मैया को अपने मुख में पूरा ब्रह्मांड दिखाया था।
ब्रह्मांड घाट का ऐतिहासिक महत्व
मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं की भूमि है, जहां हर कोना उनके दिव्य कार्यों का साक्षी है। इन्हीं लीलाओं में से एक है ‘ब्रह्मांड दर्शन लीला’, जो यशोदा मैया के प्रेम और कृष्ण की दिव्यता को दर्शाती है। कथा के अनुसार, बाल्यकाल में भगवान श्रीकृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ यमुना किनारे गाय चराने जाया करते थे।
कृष्ण की बचपन की शरारतों में से एक थी मिट्टी खाना। जब गांव के बच्चों ने यह बात यशोदा मैया से कही, तो उन्होंने आश्चर्य से कृष्ण से पूछा – लल्ला, क्या तुमने मिट्टी खाई है? कृष्ण ने मासूमियत से सिर हिला कर मना कर दिया।
फिर भी जब यशोदा मैया ने सत्य जानने के लिए उनका मुंह खोला, तो जो दृश्य उन्होंने देखा, वह किसी सामान्य मां के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के लिए चमत्कार था। भगवान श्रीकृष्ण के मुख में उन्हें पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। तभी से इस स्थान को ‘ब्रह्मांड घाट’ कहा जाने लगा और यहां बने मंदिर का नाम पड़ा ‘ब्रह्मांड बिहारी मंदिर’।
मंदिर की विशेषता: मिट्टी के पेड़ों का भोग
इस मंदिर की सबसे अनोखी परंपरा यह है कि यहां भगवान को मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है। यह भोग किसी प्रतीकात्मक अर्थ में नहीं, बल्कि वास्तव में यमुना जी की मिट्टी से बने पेड़े होते हैं।
मंदिर परिसर के पास बहती पवित्र यमुना नदी से ही मिट्टी निकाली जाती है। फिर इस मिट्टी को गूंथकर पेड़े का आकार दिया जाता है, जिन्हें भगवान को चढ़ाने के बाद प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को वितरित किया जाता है।
इन मिट्टी के पेड़ों को श्रद्धालु अपने घर लेकर जाते हैं और मान्यता है कि यह प्रसाद घर में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।
श्रद्धालुओं की आस्था और परंपरा
हर दिन यहां हजारों श्रद्धालु ब्रह्मांड बिहारी मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। वे पहले यमुना जी में स्नान करते हैं, फिर मंदिर में पूजा-अर्चना कर भगवान को मिट्टी के पेड़े का भोग लगाते हैं। श्रद्धालुओं का कहना है कि जब वे यहां आते हैं, तो उन्हें एक अलौकिक शांति और भक्ति का अनुभव होता है। मिट्टी का प्रसाद पाकर उन्हें ऐसा लगता है मानो वे स्वयं कृष्ण की बाल लीला में शामिल हो गए हों।
जानें मिट्टी का प्रसाद’ बनाने की परंपरा
मंदिर परिसर में कई परिवार पीढ़ियों से मिट्टी के पेड़े बनाने का कार्य करते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति विष्णु, जो मिट्टी के पेड़े बेचते हैं, बताते हैं— कि “यह वही स्थान है जहां भगवान कृष्ण ने मिट्टी खाई थी। इसलिए यहां मिट्टी का प्रसाद ही लगता है। भक्तजन इस प्रसाद को बड़े श्रद्धाभाव से घर लेकर जाते हैं।”
विष्णु के अनुसार, मिट्टी के पेड़े बनाना एक पवित्र कार्य माना जाता है। इस प्रसाद को बनाने के लिए मिट्टी में किसी भी प्रकार का रासायनिक पदार्थ या अशुद्धि नहीं मिलाई जाती। यह शुद्ध यमुना जी की मिट्टी से ही तैयार किया जाता है।
जानिए ब्रह्मांड बिहारी: नाम और अर्थ
कहा जाता है कि भगवान कृष्ण के मुख में जब यशोदा मैया ने ब्रह्मांड देखा, तो उनके लिए यह दृश्य अवर्णनीय था। तभी से इस स्थान का नाम पड़ा ‘ब्रह्मांड घाट’, और भगवान का नाम रखा गया ‘ब्रह्मांड बिहारी’—अर्थात् वह जो ब्रह्मांड में विराजमान हैं।
कृष्ण की बाल लीलाओं में यह कथा सबसे लोकप्रिय मानी जाती है। यह न केवल भक्तिभाव का प्रतीक है, बल्कि यह सिखाती भी है कि ईश्वर सृष्टि के हर कण में विद्यमान हैं।
मंदिर का वर्तमान है यह स्वरूप
आज का ब्रह्मांड बिहारी मंदिर भव्यता और शांति का संगम है। मंदिर परिसर में कृष्ण-बलराम और यशोदा मैया की सुंदर मूर्तियाँ स्थापित हैं। चारों ओर से यमुना तट की सुगंध और वातावरण भक्तों को दिव्य अनुभूति कराता है।
त्योहारों के समय, विशेष रूप से जन्माष्टमी और बाल लीला पर्व पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर को फूलों और दीपों से सजाया जाता है और चारों ओर “जय कन्हैया लाल की” के जयकारे गूंजते हैं।
पढ़िए धार्मिक और सांस्कृतिक संदेश
मथुरा का ब्रह्मांड बिहारी मंदिर यह दर्शाता है कि भक्ति केवल आडंबरों में नहीं, बल्कि सरलता में निहित है। यहां भगवान को मिट्टी का भोग लगाना यह प्रतीक है कि ईश्वर सृष्टि के हर तत्व में विद्यमान हैं, चाहे वह मिट्टी ही क्यों न हो।
यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि कृष्ण की लीलाएं केवल कहानियां नहीं, बल्कि वे जीवन के गहरे दर्शन समेटे हुए हैं— सादगी, प्रेम और सर्वत्र ईश्वर की उपस्थिति का संदेश।