Bihar में खून और सियासत का खेल, ‘छोटे सरकार’ अनंत सिंह पर हत्या का इल्ज़ाम!
खून से लाल मोकामा की मिट्टी, ‘छोटे सरकार’ अनंत सिंह पर हत्या का इल्ज़ाम — बिहार की राजनीति में फिर उठा बाहुबली राज का भूत!
बिहार की सियासत में जब भी ‘बाहुबली’ शब्द गूंजता है, तो मोकामा का नाम सबसे पहले उभरता है — और उसके साथ एक चेहरा… अनंत कुमार सिंह, जिसे लोग प्यार से ‘छोटे सरकार’ कहते हैं, मगर विरोधी ‘खौफ का दूसरा नाम’ है
अब उसी मोकामा की मिट्टी फिर से खून से लाल हो गई है। जनसुराज समर्थक दुलारचंद यादव की निर्मम हत्या ने एक बार फिर बिहार की राजनीति की हिंसक विरासत को सामने ला खड़ा किया है। गोली, खून और राजनीति का यह संयोग राज्य की सियासत पर गहरे सवाल छोड़ रहा है।
हत्या जिसने हिला दिया मोकामा
यह घटना किसी फिल्मी सीन से कम नहीं थी। गुरुवार दोपहर बसावनचक गांव के एक शांत इलाके में कुछ ही मिनटों में सब कुछ बदल गया।
70 साल के दुलारचंद यादव, जो जनसुराज अभियान के तहत मतदाताओं से मुलाकात कर रहे थे, अचानक गोलियों की आवाज़ में गिर पड़े।
गवाह बताते हैं — “पहले गोलियों की बौछार हुई, फिर गाड़ी चढ़ाकर कुचल दिया गया।”
कुछ ही क्षणों में पूरा इलाका दहशत में था, लोग घरों के दरवाजे बंद कर चुके थे, और सियासत फिर से बारूद में घिर चुकी थी।
‘छोटे सरकार’ पर सीधे आरोप, राजनीति में मचा बवाल
हत्या के बाद सबसे बड़ा सवाल उठा — क्या यह राजनीतिक बदले की आग है?
परिजनों और समर्थकों ने सीधे-सीधे अनंत कुमार सिंह का नाम लिया। आरोप है कि यह हमला सत्ता और वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा था।
इधर, अनंत सिंह ने सभी आरोपों से इनकार किया है और कहा है कि यह साजिश उन्हें फंसाने की है।
लेकिन जनता के ज़ेहन में सवाल फिर वही पुराना उठ खड़ा हुआ — क्या बिहार की राजनीति कभी बाहुबलियों के साए से मुक्त हो पाएगी?
अनंत सिंह — एक नाम, कई कहानियाँ
कभी आरजेडी के करीबी, कभी निर्दलीय ताक़त और अब बार-बार विवादों में घिरे — अनंत सिंह की कहानी किसी अपराधी दंतकथा से कम नहीं।
उनकी कुंडली में हत्या, अपहरण, रंगदारी और हथियारों की बरामदगी के कई केस दर्ज हैं।
एक वक्त था जब उनके आवास से पुलिस ने AK-47, हैंड ग्रेनेड और कारतूसों का जखीरा बरामद किया था।
फिर भी चुनावी मैदान में उनका जलवा कायम रहा।
लोग कहते हैं — “मोकामा में पुलिस की नहीं, छोटे सरकार की चलती है।”
अब उसी ‘छोटे सरकार’ का नाम फिर से एक हत्या से जुड़ गया है।
मोकामा — जहां खामोशी भी खौफ में डूबी है
आज मोकामा के लोग खुलकर बोलने से डरते हैं। गलियों में कानाफूसी है, घरों में चर्चा है, और चौपालों पर खामोशी का राज।
कोई खुले में कुछ नहीं कहता, मगर सब जानते हैं कि यह इलाका सत्ता और बंदूक के गठजोड़ से सांस लेता है।
बूढ़े किसान कहते हैं — “हमने अनंत को बच्चा देखा है, लेकिन अब वो राजनीति में हथियार लेकर चलता है।”
यह बयान बिहार की सियासी हकीकत को नंगा कर देता है।
कानून व्यवस्था पर बड़ा सवाल
इस हत्या ने न सिर्फ एक व्यक्ति की जान ली, बल्कि प्रशासनिक निष्क्रियता को भी उजागर कर दिया।
हर चुनाव में हिंसा, हर झगड़े में गोलियाँ — और फिर वही बयान, वही जांच, वही चुप्पी।
बिहार के लोग अब पूछ रहे हैं — “अगर नेताओं की बंदूकें ही कानून तय करेंगी, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए?”
राजनीति या अपराध का खेल?
बिहार की राजनीति में यह सवाल नया नहीं, मगर हर हत्या के बाद यह और बड़ा हो जाता है।
जहां अपराधी नेता बनते हैं, और नेता अपराधी की तरह बर्ताव करते हैं, वहां जनता केवल तमाशबीन बनकर रह जाती है।
मोकामा की यह घटना इस सच्चाई की एक और जिंदा मिसाल है।
रक्तरंजित राजनीति का नया अध्याय
मोकामा की लाल मिट्टी में इस बार फिर खून बहा है, और उसके छींटे सीधे बिहार की राजनीति पर पड़े हैं।
अनंत सिंह पर लगे आरोप सिर्फ एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ हैं जो अपराध को सत्ता की सीढ़ी बनाती है।
अब देखना यह है — क्या यह मामला भी बाकी मामलों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा, या इस बार बिहार न्याय की मिसाल बनेगा?
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