भक्तों के सम्मान से मिलता है परिवार को सुख: तुरंत पढ़ें विभीषण व विदुर जी के ये बड़े उदाहरण
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Dharmik: धार्मिक परंपराओं और शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं जहाँ भक्तों और पुण्यवान आत्माओं के सम्मान का महत्व बताया गया है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण उदाहरण लंका नरेश रावण और भगवत भक्त विभीषण जी का है।
विभीषण के बाद रवां के पास न बचा था कोय
प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब तक विभीषण जी लंका में रहे, रावण के पापों के बावजूद लंका में सुख और समृद्धि बनी रही। लेकिन जैसे ही रावण ने विभीषणजी का अपमान किया और उन्हें लंका छोड़ने को कहा,
तभी से रावण के विनाश की शुरुआत हो गई। अंततः सोने की लंका का दहन हुआ और रावण के पीछे कोई रोने वाला भी नहीं बचा।
विदुर जी का भी हुआ था अपमान
इसी प्रकार महाभारत काल में जब तक विदुर जी हस्तिनापुर में रहे, तब तक कौरवों का राज्य वैभवशाली रहा। मगर जैसे ही विदुर जी का अपमान हुआ और उन्होंने राज्य छोड़ दिया, उसी क्षण से हस्तिनापुर में पतन का दौर शुरू हो गया।
भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं विदुर जी को तीर्थ यात्रा के लिए भेजा और उनके जाते ही कौरवों के साम्राज्य का अंत हो गया।
मिलती है सीख – आगे पढ़िए
इन प्रसंगों से यह स्पष्ट होता है कि जिस परिवार या समाज में भक्त और पुण्यवान आत्माएं रहती हैं, वहाँ सुख और आनंद स्वाभाविक रूप से बना रहता है।
इसलिए, किसी भी परिवार के सदस्य का अपमान न करें, विशेष रूप से उस व्यक्ति का नहीं जो भक्ति भाव से जीवन जीता हो।
सम्मान का मतलब होगा यह
अतः हमें अपने परिवार में ऐसे सदस्यों का सम्मान करना चाहिए जो भक्ति और धर्म के मार्ग पर चल रहे हों। हो सकता है कि आज जो सुख और समृद्धि हमें मिल रही हो, वह उसी पुण्यात्मा के कारण मिल रही हो।
इसीलिए, सदैव ईश्वर और शास्त्रों के प्रति समर्पित रहें, परिवार के भक्तजनों को सम्मान दें और उनके मार्गदर्शन में चलने का प्रयास करें। जहाँ धर्म की जड़ मजबूत होती है, वहाँ अशुभ कर्म भी कदम रखने से डरते हैं।