इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सपा सांसद को चौथी पत्नी को देना होगा गुजारा भत्ता, पढ़िए क्यों?
उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है। रामपुर के समाजवादी पार्टी (सपा) सांसद **मोहिबुल्लाह नदवी** को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी चौथी पत्नी रुमाना को हर महीने 30,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में देने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले को न्यायालय के मध्यस्थता केंद्र (Mediation Center) के माध्यम से निपटाने के लिए तीन महीने का समय दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि सांसद को कुल 55,000 रुपये जमा करने होंगे, जिसमें से 30,000 रुपये मासिक भरण-पोषण के रूप में और 25,000 रुपये अन्य खर्चों के लिए निर्धारित किए गए हैं। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि सांसद इस आदेश का पालन करने में विफल रहते हैं या तीन महीने में समझौता नहीं हो पाता, तो अदालत अपनी अगली सुनवाई जारी रखेगी।
जानिए मामला क्या है?
सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और उनकी पत्नी रुमाना के बीच पिछले कई वर्षों से वैवाहिक विवाद चल रहा है। रुमाना के अनुसार, उनका निकाह 22 अक्टूबर 2012 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद उन्हें पता चला कि उनके पति की यह चौथी शादी है।
रुमाना ने अदालत में बताया कि मोहिबुल्लाह नदवी की पहली पत्नी का निधन कैंसर से हो गया था, जिससे उन्हें दो बेटियां हैं। इसके बाद उन्होंने दो और निकाह किए, और रुमाना उनकी चौथी पत्नी हैं। वर्तमान में सांसद अपनी पांचवीं पत्नी के साथ रह रहे हैं।
पढ़िए कोर्ट की सख्ती और निर्देश
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वैवाहिक विवादों में समझौता और मध्यस्थता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि दोनों पक्षों को न्याय और सम्मानजनक समाधान मिल सके। अदालत ने दोनों पक्षों को तीन महीने के भीतर मध्यस्थता केंद्र में उपस्थित होकर आपसी सहमति से निर्णय लेने का अवसर प्रदान किया है।
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि यदि सांसद नदवी तीन महीने में भरण-पोषण की राशि नहीं देते हैं या मध्यस्थता विफल रहती है, तो अदालत स्वयं सुनवाई जारी रखेगी और मामले में अंतिम आदेश पारित करेगी।
पत्नी की ओर से लगाए गए यह आरोप
रुमाना ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से उन्हें मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया गया। उन्होंने कहा कि जब उन्हें अपने पति की अन्य शादियों की जानकारी मिली, तो उन्होंने विरोध किया, लेकिन इसके बाद उन्हें परिवार से दूर कर दिया गया।
रुमाना का कहना है कि वह अब अपने और अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए न्याय की मांग कर रही हैं। उन्होंने कहा कि अदालत का यह निर्णय उनके लिए एक राहत और उम्मीद की किरण है।
न्याय और महिला अधिकारों की दृष्टि से अहम फैसला
यह फैसला महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा और न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला उन महिलाओं के लिए भी उदाहरण बनेगा जो वैवाहिक विवादों में न्याय पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
वहीं, अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि भरण-पोषण (Maintenance) का अधिकार हर पत्नी को है, भले ही पति ने आगे विवाह कर लिया हो। यह न केवल कानूनी, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है।
समाज में संदेश
इस निर्णय ने एक बार फिर यह दर्शाया है कि न्यायपालिका समानता और पारिवारिक सम्मान की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। साथ ही, यह फैसला यह भी दर्शाता है कि किसी भी स्थिति में महिला के अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि आने वाले तीन महीनों में मध्यस्थता केंद्र में समझौता होता है या नहीं। यदि नहीं, तो मामला आगे की कानूनी कार्रवाई की ओर बढ़ेगा।