शारदीय नवरात्र 2025: पढ़िए भगवान राम की पूजा और माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर वध की पौराणिक कथा

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भारत में त्योहारों की परंपरा हमेशा से धर्म, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम रही है। इन्हीं में से एक प्रमुख पर्व है शारदीय नवरात्रि, जो शक्ति की उपासना और धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व न केवल माँ दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की आराधना से जुड़ा है, बल्कि इसके साथ दो प्रमुख पौराणिक प्रसंग भी जुड़े हुए हैं। पहला प्रसंग माँ दुर्गा द्वारा महिषासुर वध का है और दूसरा भगवान श्रीराम द्वारा नवरात्र की शुरुआत का उल्लेख करता है। दोनों ही कथाएँ इस पर्व को और अधिक पावन एवं महत्वपूर्ण बनाती हैं।

माँ दुर्गा और महिषासुर वध की कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय महिषासुर नामक शक्तिशाली असुर ने घोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा से अजेय होने का वरदान प्राप्त किया। वरदान के प्रभाव से वह अहंकारी हो गया और उसने धरती से लेकर स्वर्ग तक पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। देवता उसकी शक्ति के सामने हार गए और सहायता के लिए भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुँचे।

तब तीनों देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियों को मिलाकर माँ दुर्गा की रचना की। माँ दुर्गा ने अपने प्रचंड रूप में महिषासुर को ललकारा। यह युद्ध लगातार **नौ दिनों तक** चलता रहा। अंततः दसवें दिन माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध कर अधर्म और अन्याय का अंत किया। यही कारण है कि नवरात्र के नौ दिन शक्ति की साधना और दसवाँ दिन **विजयदशमी** यानी धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है।

भगवान श्रीराम द्वारा नवरात्रि की शुरुआत

शारदीय नवरात्रि से जुड़ी एक अन्य महत्वपूर्ण कथा भगवान श्रीराम की है। माना जाता है कि लंका युद्ध से पहले भगवान श्रीराम ने ही इस पर्व की शुरुआत की थी।

पौराणिक कथा के अनुसार, जब राम और रावण के बीच युद्ध होने वाला था, तब भगवान ब्रह्मा ने श्रीराम से कहा कि वे देवी दुर्गा की पूजा कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस पर श्रीराम ने अश्विन मास के शुक्ल पक्ष में नौ दिनों तक माँ दुर्गा की घोर साधना की।

कहा जाता है कि उन्होंने पूजा में 108 कमल पुष्प अर्पित करने का संकल्प लिया था। किंतु रावण ने अपनी माया से उनमें से एक कमल चुरा लिया। जब श्रीराम को यह ज्ञात हुआ कि एक पुष्प कम है, तब उन्होंने सोचा कि उन्हें *कमलनयन* कहा जाता है, इसलिए वे अपनी आँख माँ को अर्पित कर देंगे। जैसे ही श्रीराम अपनी नेत्र अर्पित करने वाले थे, माँ दुर्गा प्रकट हो गईं और उन्होंने श्रीराम को ऐसा करने से रोका।

माँ उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्हें दिव्य अस्त्र प्रदान किया। इसी अस्त्र की सहायता से श्रीराम ने रावण का वध किया और धर्म की विजय स्थापित की। यही कारण है कि दशहरा का पर्व श्रीराम की लंका विजय और रावण वध की स्मृति में भी मनाया जाता है।

शारदीय नवरात्र का आध्यात्मिक महत्व

शारदीय नवरात्रि न केवल एक धार्मिक पर्व है बल्कि यह साधना, संयम और शक्ति की साधना का भी अवसर है। नौ दिनों तक लोग माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा करते हैं।

इन नौ दिनों के व्रत और उपासना से व्यक्ति के भीतर आत्मबल, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वहीं, दसवाँ दिन विजयदशमी इस संदेश को स्थापित करता है कि सत्य और धर्म की हमेशा जीत होती है, चाहे अधर्म और अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।

समापन

इस प्रकार, शारदीय नवरात्र महिषासुर वध की पौराणिक कथा और भगवान श्रीराम की पूजा—दोनों ही कथाओं से जुड़ा हुआ है। एक ओर यह पर्व माँ दुर्गा की शक्ति और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है, वहीं दूसरी ओर यह श्रीराम की आराधना और रावण वध की स्मृति को भी संजोए हुए है।

आस्था, श्रद्धा और शक्ति का यह अद्भुत संगम हर वर्ष भक्तों के हृदय को ऊर्जा और भक्ति से भर देता है। यही कारण है कि शारदीय नवरात्र न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी भारतीय जीवन का अभिन्न अंग है।

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