Pilibhit: सखिया गांव में चढ़ावे का पैसा वसूला जाएगा, कमेटी गठित
Pilibhit: सखिया गांव के चमत्कारी देवस्थान पर लौटी रौनक, संत समाज की भूख हड़ताल के बाद प्रशासन ने हटाई रोक
आस्था की ताकत कभी झुकती नहीं — ये बात एक बार फिर सच साबित हुई है पीलीभीत के बीसलपुर तहसील के सखिया गांव में, जहां तीन महीने से बंद पड़े ढकुलिया वाले बाबा ब्रह्मदेव के चमत्कारी देवस्थान पर अब फिर से पूजा-पाठ की घंटियां गूंजने लगी हैं।
जूना अखाड़ा के साधु-संतों की भूख हड़ताल और अखिल भारत हिंदू महासभा के हस्तक्षेप के बाद जिला प्रशासन ने आखिरकार देवस्थान पर लगी रोक को हटा दिया है।
बाबाओं की भूख हड़ताल से हरकत में प्रशासन, फिर से शुरू हुआ पूजा-पाठ
बीते बुधवार को संत समाज की अगुवाई में चल रहा बाबा सत्यगिरि महाराज का अनशन समाप्त हो गया।
बीसलपुर एसडीएम नागेंद्र पांडे और प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता के बाद यह निर्णय लिया गया कि अब देवस्थान पर रोज़ाना सुबह-शाम पूजा-पाठ और श्रद्धालुओं की आवाजाही सामान्य रूप से होगी।
हालांकि प्रशासन ने साफ़ किया है कि यहां किसी भी प्रकार का मेला, दुकान या व्यावसायिक गतिविधि पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगी।
कैसे शुरू हुआ था विवाद — चमत्कार से व्यापार तक की कहानी
दरअसल, सखिया गांव में एक पीपल के पेड़ को ‘चमत्कारी’ बताया गया था।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस पेड़ की परिक्रमा करने से गंभीर बीमारियां तक ठीक हो जाती हैं।
धीरे-धीरे ये जगह धार्मिक केंद्र बन गई और लाखों श्रद्धालु पहुंचने लगे।
लोगों की बढ़ती भीड़ ने इस स्थल को “मेला स्थल” में बदल दिया —
करीब 500 दुकानें, खाने-पीने की स्टॉल, मिठाई, खिलौने, प्रसाद, और झूले तक लगने लगे।
हर दिन हजारों की भीड़ उमड़ने लगी और चढ़ावे के लाखों रुपये जमा होने लगे।
बिना अनुमति के मेला, प्रशासन की सख्ती
प्रशासनिक जांच में खुलासा हुआ कि मेला बिना किसी अनुमति या कमेटी गठन के संचालित किया जा रहा था।
ADM ऋतु पुनिया ने मौके पर पहुंचकर पूरा मेला बंद कराने का आदेश दिया और आयोजकों को कड़ी चेतावनी दी।
ग्रामीणों ने भी सामूहिक रूप से मांग की कि मेला कराने वालों से तीन महीने का चढ़ावे का हिसाब लिया जाए, क्योंकि लोगों ने छत्रपाल और उसके बेटे पर रुपये गबन करने का आरोप लगाया था।
संत समाज का आक्रोश, भूख हड़ताल से पलटा फैसला
जब प्रशासन ने देवस्थान पर श्रद्धालुओं के जुटने पर रोक लगा दी,
तो जूना अखाड़ा के साधु-संतों ने इसे “आस्था पर प्रहार” बताया और भूख हड़ताल शुरू कर दी।
भक्तों और हिंदू संगठनों में आक्रोश बढ़ने लगा।
आख़िरकार, जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह के निर्देश पर प्रशासन और संत समाज के बीच सकारात्मक वार्ता हुई,
जिसके बाद निर्णय लिया गया कि —
देवस्थान खुला रहेगा, पूजा-पाठ जारी रहेगा,
पर मेला और दुकानों पर रोक बनी रहेगी।
कमेटी होगी गठन, एक महंत संभालेंगे व्यवस्था
एक सप्ताह के अंदर एक समिति (कमेटी) गठित की जाएगी,
जो देवस्थान की संपूर्ण देखरेख, चढ़ावे का हिसाब और भक्तों की सुविधाओं की जिम्मेदारी संभालेगी।
देवस्थान पर अब एक महंत की नियुक्ति की जाएगी,
भक्तों के ठहरने और भोजन की व्यवस्था भी की जाएगी।
साथ ही यह भी तय हुआ है कि चढ़ावे के पैसों से देवस्थान का कायाकल्प और विकास कार्य किया जाएगा।
संत समाज का बयान, “आस्था जीती, स्वार्थ हारा”
बाबा सत्यगिरि महाराज ने अनशन समाप्त करते हुए कहा —
“यह सिर्फ़ हमारा नहीं, जनता की आस्था का विजय है।
प्रशासन ने हमारी मांगें मानीं, अब देवस्थान पर भक्तों की सेवा और भक्ति दोनों साथ चलेंगी।”
चमत्कार, विवाद और व्यवस्था का संतुलन
यह पूरा मामला बताता है कि जहां आस्था होती है, वहां व्यवस्था को भी सजग रहना पड़ता है।
सखिया गांव का यह देवस्थान न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि यह उस संघर्ष का प्रतीक बन गया है जहां
भक्ति और प्रशासन के बीच संवाद से समाधान निकला।
Pilibhit के सखिया गांव का काला सच उजागर, प्रशासन बड़ी कार्रवाई करने वाला है