मुरुदेश्वर मंदिर: पढ़िए किस तट पर स्थित है भव्य शिवधाम और क्यों है अद्भुत आस्था का केंद्र
भारत में धार्मिक और आध्यात्मिक धरोहरों की कोई कमी नहीं है। हर राज्य में एक से बढ़कर एक मंदिर, मठ और तीर्थस्थल हैं जो श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक हैं। इन्हीं में से एक है — मुरुदेश्वर मंदिर, जो कर्नाटक राज्य के उत्तर कन्नड़ जिले की भटकल तालुका में स्थित है। यह मंदिर न केवल भगवान शिव के प्रति आस्था का केंद्र है, बल्कि अपनी भव्यता, प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक महत्व के कारण देश-विदेश के पर्यटकों को आकर्षित करता है।
स्थान और भौगोलिक महत्व
मुरुदेश्वर मंदिर अरब सागर के तट* पर बसा हुआ है, जो भटकल नगर से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह दक्षिण भारत की यात्रा के महत्वपूर्ण मार्ग में आता है — उडूपी से लगभग 101 किलोमीटर और गोकर्ण से मात्र 71 किलोमीटर की दूरी पर। इन दोनों शहरों की धार्मिक महत्ता के कारण मुरुदेश्वर भी श्रद्धालुओं के लिए एक अनिवार्य तीर्थ बन गया है।
मुरुदेश्वर: कर्नाटक का पवित्र पंचक्षेत्र
कर्नाटक में भगवान शिव के पाँच प्रमुख पवित्र स्थलों को “पंचक्षेत्र” कहा जाता है — धर्मस्थल, नंजनगुड, गोकर्ण, धारेश्वर और मुरुदेश्वर। कहा जाता है कि ये सभी स्थान रावण द्वारा तोड़े गए आत्मलिंग के पाँच टुकड़ों से जुड़े हैं। मुरुदेश्वर वही स्थान है जहाँ आत्मलिंग का एक अंश और उस पर ढका हुआ कपड़ा गिरा था। इसलिए इस मंदिर को मृदेश्वर क्षेत्र या आत्मलिंग का स्थान भी कहा जाता है।
मुरुदेश्वर मंदिर का पौराणिक इतिहास
मुरुदेश्वर मंदिर का इतिहास रामायण काल से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार, लंका के राजा रावण ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे “आत्मलिंग” प्रदान किया, लेकिन यह शर्त रखी कि वह इसे कहीं भी धरती पर न रखे, वरना यह वहीं स्थिर हो जाएगा।
जब रावण आत्मलिंग को लेकर लंका जा रहा था, तब देवताओं को भय हुआ कि वह इससे अजेय न बन जाए। इस स्थिति से बचने के लिए भगवान विष्णु और गणेशजी ने एक योजना बनाई। गणेश ने बालक का रूप धारण कर रावण को भ्रमित किया और उससे आत्मलिंग को कुछ समय के लिए पकड़ा लिया। जैसे ही गणेश ने उसे भूमि पर रखा, आत्मलिंग वहीं स्थिर हो गया।
रावण ने क्रोध में उसे उठाने का प्रयास किया, लेकिन वह केवल कुछ टुकड़े ही तोड़ पाया। वे टुकड़े कर्नाटक के विभिन्न स्थानों पर गिरे, जिनमें से एक मुरुदेश्वर में आकर गिरा। यही टुकड़ा आज इस मंदिर का मुख्य देवता है। इस कथा का पूरा विवरण शिव पुराण में मिलता है।
मंदिर की स्थापत्य कला और भव्य संरचना
मुरुदेश्वर मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारतीय शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर परिसर में बना 20 मंजिला राजगोपुरम विश्व का सबसे ऊँचा गोपुरम माना जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 237 फीट है, और इसमें लगी लिफ्ट के माध्यम से आगंतुक ऊपर जाकर पूरे परिसर और समुद्र का अद्भुत दृश्य देख सकते हैं।
मंदिर के बीचों-बीच भगवान शिव की 123 फीट ऊँची प्रतिमा है, जो विश्व की दूसरी सबसे बड़ी शिव प्रतिमा मानी जाती है। इस विशाल प्रतिमा के निर्माण में लगभग दो वर्ष का समय और 5 करोड़ रुपये की लागत लगी। इसे प्रसिद्ध उद्योगपति और समाजसेवी आर.एन. शेट्टी ने 2006 में बनवाया था।
इस प्रतिमा को इस प्रकार बनाया गया है कि सूर्य की पहली किरणें भगवान शिव के चेहरे पर पड़ें। समुद्र के किनारे स्थित होने के कारण यह प्रतिमा कई किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती है, जो इसे और भी दिव्य बनाती है।
नक्काशी और पौराणिक दृश्य
राजगोपुरम की दीवारों और स्तंभों पर हिंदू पौराणिक कथाओं के अद्भुत दृश्य उकेरे गए हैं। यहाँ समुद्र मंथन, राम-रावण युद्ध, और गणेश द्वारा आत्मलिंग को स्थापित करने की घटनाएँ अत्यंत कलात्मक ढंग से दर्शाई गई हैं। ये नक्काशियां न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भारतीय कला की गहराई को भी उजागर करती हैं।
भूकैलासा गुफा संग्रहालय: पौराणिकता और आधुनिकता का संगम
मंदिर परिसर में स्थित भूकैलासा गुफा संग्रहालय इस स्थान का एक विशेष आकर्षण है। यह एक कृत्रिम गुफा है, जिसमें रावण, भगवान शिव और आत्मलिंग की कथा को मूर्तियों और दृश्यों के माध्यम से दर्शाया गया है।
संग्रहालय में प्रकाश और ध्वनि का अत्यंत सुंदर संयोजन है। साथ ही, एक ऑडियो गाइड भी उपलब्ध है जो हर दृश्य का वर्णन करता है। यह स्थान न केवल वयस्कों बल्कि बच्चों के लिए भी ज्ञानवर्धक और मनोरंजन अनुभव प्रदान करता है।
प्रवेश द्वार में होता है विशेष स्वागत
मंदिर में प्रवेश करते समय श्रद्धालुओं का स्वागत दो विशाल **कंक्रीट के हाथियों** द्वारा किया जाता है, जो मंदिर की शोभा को और बढ़ाते हैं। मंदिर परिसर में स्वच्छता, अनुशासन और भक्तिमय वातावरण देखकर मन प्रसन्न हो उठता है।
मंदिर के निकट ही सुंदर समुद्र तट है जहाँ भक्त पूजा के बाद शांत वातावरण का आनंद ले सकते हैं। यहाँ से सूर्यास्त का दृश्य देखने हजारों पर्यटक प्रतिदिन आते हैं।
जानिए कैसे पहुंचे मुरुदेश्वर मंदिर
* सड़क मार्ग से: मुरुदेश्वर NH-66 पर स्थित है, जो मंगलुरु और गोवा को जोड़ता है।
* रेल मार्ग से: मुरुदेश्वर रेलवे स्टेशन मंदिर से मात्र 2 किलोमीटर दूर है।
* वायु मार्ग से: निकटतम हवाई अड्डा मंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 160 किमी)।
इस तरह से है धार्मिक और पर्यटन महत्व
मुरुदेश्वर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक पर्यटक आकर्षण भी है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु न केवल भगवान शिव की भव्य प्रतिमा के दर्शन करते हैं, बल्कि अरब सागर के मनमोहक दृश्य, शांत समुद्र तट और हरियाली से भरे परिदृश्य का भी आनंद उठाते हैं।
इसके साथ ही, स्थानीय दुकानों में धार्मिक वस्तुएं, शंख, मूर्तियाँ और हस्तशिल्प की वस्तुएँ भी मिलती हैं, जो स्मृति के रूप में पर्यटकों को विशेष आकर्षण देती हैं।