मिड डे मील घोटाला : दो साल बाद भी 3 आईएएस सहित 32 अफसरों पर जांच अधर में
मिड डे मील घोटाला : ईडी छापों के दो साल बाद भी जांच ठप, 32 अधिकारियों पर सरकार की चुप्पी
जयपुर @ ब्रिजेश परिडवाल
राजस्थान के बहुचर्चित मिड डे मील घोटाला में प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी को पूरे दो वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन अब तक किसी भी बड़े अधिकारी पर ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी है। एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की लगातार सिफारिशों के बावजूद सरकारी विभागों की निष्क्रियता ने इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। स्थिति यह है कि 3 आईएएस अधिकारियों समेत कुल 32 अधिकारी आज भी जांच के दायरे में आते हुए भी निर्णय के इंतजार में हैं।
एसीबी के सवालों पर विभाग मौन
ईडी से मिले ठोस सुरागों के आधार पर एसीबी ने कार्मिक विभाग, शिक्षा विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग को कई बार पत्र लिखकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत जांच की अनुमति मांगी।
हालांकि—
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किसी भी विभाग ने स्पष्ट निर्णय नहीं लिया
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फाइलें महीनों से लंबित पड़ी हैं
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जांच प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी
इससे सरकार की कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार के प्रति इच्छाशक्ति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सहकारिता विभाग पारदर्शिता पर सवाल
सहकारिता विभाग ही ऐसा विभाग रहा जिसने सीमित स्तर पर कदम उठाया।
24 अगस्त 2024 को तत्कालीन रजिस्ट्रार द्वारा गठित तीन सदस्यीय कमेटी ने प्राथमिक जांच में गंभीर अनियमितताएं पाईं और विस्तृत जांच की सिफारिश की।
कमेटी की रिपोर्ट के बाद—
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जून 2025 में 8 अधिकारियों के खिलाफ जांच की मंजूरी दी गई
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लेकिन आदेश में किसी भी अधिकारी का नाम उजागर नहीं किया गया
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केवल संख्या लिखकर अनुमति दी गई
इस प्रक्रिया ने जांच की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
15 अधिकारी, एसीबी ने मांगी जांच
एसीबी द्वारा सहकारिता विभाग को भेजी गई सूची में जिन अधिकारियों के नाम शामिल थे, उनमें प्रमुख रूप से—
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रजिस्ट्रार मुक्तानंद अग्रवाल
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कानफेड एमडी वीणा वर्मा
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वित्त अधिकारी चौथमल
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सहायक लेखाधिकारी सांवरराम
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लेखाकार लोकेश कुमार
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महाप्रबंधक अनिल कुमार
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प्रबंधक प्रतिभा सैनी
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गोदाम कीपर रामधन बैरवा
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सुपरवाइजर दिनेश शर्मा सहित अन्य
इन सभी पर पोषाहार सामग्री की खरीद-विक्री में भारी वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप हैं।
18 महीने बीते, 3 IAS समेत 32 अधिकारियों पर फैसला लंबित
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि—
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3 आईएएस अधिकारी
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लेखा सेवा के वरिष्ठ अधिकारी
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शिक्षा एवं महिला बाल विकास विभाग के अफसर
इन सभी मामलों पर पिछले 18 महीनों से कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया। विपक्षी दलों ने इसे सरकार की नाकामी बताते हुए भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने की कोशिश करार दिया है।
लाखों बच्चों के पोषण अधिकारों से जुड़ा है मामला
विशेषज्ञों का मानना है कि mid day mil scam केवल आर्थिक घोटाला नहीं है, बल्कि यह
लाखों सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पोषण अधिकारों से जुड़ा गंभीर सामाजिक अपराध है।
जांच में देरी से—
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साक्ष्य कमजोर पड़ रहे हैं
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दोषियों को बचने का मौका मिल रहा है
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सरकारी व्यवस्थाओं पर जनता का भरोसा टूट रहा है
दो साल बाद भी mid day mil scam में जांच का आगे न बढ़ना सरकार की प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करता है। अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार कब इस चुप्पी को तोड़ेगी और क्या वास्तव में दोषियों तक कार्रवाई पहुंच पाएगी।
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