मराठा आंदोलन, मराठी भाषा को लेकर मुंबई में प्रदर्शन तेज
मराठा आंदोलन, मुंबई में मराठा समाज का आरक्षण और मराठी भाषा के सम्मान को लेकर भयंकर आंदोलन, सड़कों पर उमड़े हजारों लोग। सरकार से आर-पार की लड़ाई!
मराठा आंदोलन, मराठा भाषा और आरक्षण को लेकर मुंबई सड़कों पर उबाल पर – सरकार से आर-पार की लड़ाई पर आमादा मराठा समाज!
🔻 मराठा अस्मिता के लिए उठी आवाज, मुंबई में जोरदार प्रदर्शन
मुंबई: महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई एक बार फिर मराठा समाज की गूंज से भर उठी है। सड़कों पर उतरे हजारों मराठा युवा, बुजुर्ग और महिलाएं सिर्फ आरक्षण और मराठी भाषा के सम्मान की मांग कर रहे हैं। जहां एक ओर मराठा समाज शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण के लिए आंदोलनरत है, वहीं दूसरी ओर मराठी भाषा की उपेक्षा को लेकर आक्रोश भी चरम पर है।
मराठा आंदोलन, क्या हैं आंदोलन की मुख्य मांगें?
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मराठा समाज को स्थायी और कानूनी आरक्षण मिले, जो न्यायालय द्वारा रद्द न किया जा सके।
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मराठी भाषा को महाराष्ट्र में सर्वप्रथम प्राथमिकता मिले – विशेषकर शिक्षा, सरकारी दफ्तरों और न्याय प्रणाली में।
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महाराष्ट्र में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए मराठी भाषा की अनिवार्यता सुनिश्चित की जाए।
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मराठा पहचान और संस्कृति को संरक्षित करने के लिए अलग आयोग का गठन किया जाए।
आंदोलन की आग – कहां-कहां फैली?
मुंबई के आजाद मैदान, दादर, घाटकोपर, और ठाणे इलाकों में मराठा संगठनों के हजारों कार्यकर्ता भारी संख्या में जमा हुए। आंदोलन को मराठा क्रांति मोर्चा, मराठा सेवा संघ, और मराठा युवा वाहिनी जैसे संगठनों का साथ मिला है।
विरोध के दौरान कई जगहों पर ट्रैफिक बाधित हुआ और रेल रोको जैसे आक्रामक कदम भी सामने आए। पुलिस ने एहतियात के तौर पर धारा 144 भी लागू की, लेकिन मराठा युवाओं के हौसले में कोई कमी नहीं दिखी।
मराठा आंदोलन, राजनीतिक गलियारों में हड़कंप
मराठा आंदोलन को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की नींद उड़ गई है।
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा है कि सरकार मराठा समाज की भावनाओं का सम्मान करती है और जल्द कोई “ठोस फैसला” लिया जाएगा।
वहीं विपक्ष के नेताओं – शरद पवार, उद्धव ठाकरे और राहुल गांधी – ने भी आंदोलन को समर्थन देते हुए सरकार पर “वादा खिलाफी” का आरोप लगाया है।
मराठा आंदोलन, क्यों जगी मराठी भाषा को लेकर नाराज़गी?
मराठा समाज का एक बड़ा तबका यह मानता है कि मराठी भाषा को उसके ही राज्य में पीछे धकेला जा रहा है।
प्राइवेट स्कूलों में हिंदी और इंग्लिश को प्रमुखता मिल रही है। यहां तक कि बैंक, अस्पताल और अदालतों में भी मराठी बोलने वालों को उपेक्षित किया जाता है।
यह भाषा के अस्तित्व पर सीधा हमला माना जा रहा है और यही कारण है कि अब यह आंदोलन सिर्फ आरक्षण नहीं बल्कि “मराठी अस्मिता बचाओ आंदोलन” बन चुका है।
भविष्य की संभावित कार्रवाई क्या हो सकती है?
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सरकार विशेष सत्र बुलाकर मराठा आरक्षण बिल ला सकती है।
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मराठी भाषा को अनिवार्य विषय के रूप में सभी शैक्षिक संस्थानों में लागू किया जा सकता है।
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आंदोलन और सरकार के बीच सांविधानिक संवाद की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
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यदि मांगे नहीं मानी गईं, तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है, जिसकी गूंज महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव तक पहुंच सकती है।
क्या यह सिर्फ आंदोलन नहीं, मराठा अस्मिता की हुंकार है!
आज महाराष्ट्र की सड़कों पर जो हो रहा है, वो एक समाज की अपनी पहचान, भाषा और अधिकारों को लेकर बगावत है। यह संघर्ष सिर्फ मराठा समाज का नहीं बल्कि हिन्दुस्तान की भाषाई और सामाजिक विविधता के सम्मान का भी प्रतीक है।
सरकार को इस आंदोलन को सिर्फ राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक न्याय के नजरिए से देखना होगा।