Mahoba: आत्महत्या का दर्दनाक मंजर और पुलिस की सतर्कता, दिल दहला देगा ये वीडियो
Mahoba: पुलिस की सतर्कता से बची युवक की जान, परिवारिक प्रताड़ना से परेशान कर रहा था आत्महत्या की कोशिश
दर्दनाक मंजर और पुलिस की सतर्कता
महोबा की रात एक दर्दनाक हादसे में बदल सकती थी, लेकिन पुलिस की सतर्कता ने एक युवक की जान बचा ली। पारिवारिक कलह से परेशान युवक जंगल में पेड़ पर फांसी लगाने पहुंचा था। अंधेरे में सड़क किनारे खड़ी उसकी बाइक देखकर चौकी प्रभारी नरेश चंद्र निगम और उनकी टीम मौके पर पहुंचे। टॉर्च की रोशनी में युवक पेड़ पर चढ़ा हुआ नजर आया और मौत को गले लगाने ही वाला था। ऐसे नाजुक पल में नरेश चंद्र निगम ने बिना घबराए धैर्य और समझदारी से बात की, उसे न्याय का भरोसा दिलाया और आत्महत्या से रोक लिया। उनकी सूझबूझ और मानवीय संवेदनशीलता ने एक जिंदगी को बचा लिया और यह साबित कर दिया कि पुलिस सिर्फ कानून की रखवाली ही नहीं करती, बल्कि जरूरत पड़ने पर जीवन रक्षक भी बन जाती है
Mahoba:युवक की पहचान और दर्दभरी दास्तां उसी की जुबानी
युवक की पहचान पनवाड़ी निवासी रामकेश राजपूत के रूप में हुई है। पुलिस ने जब उससे बातचीत की तो वह भावुक होकर बोला – “मुझे मरना है, मैं पुलिस से नहीं डरता।” यह बयान खुद में एक गहरी कहानी बयां करता है। युवक ने बताया कि वह परिवार की मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने पर मजबूर हुआ।
Mahoba:परिवारिक कलह या दबंगई का खेल?
ग्रामीणों और आसपास के लोगों के मुताबिक यह मामला सिर्फ सामान्य कलह तक सीमित नहीं है। कहा जा रहा है कि युवक के ही परिवार का एक भाई उत्तर प्रदेश पुलिस में तैनात है, और अपने रसूख और पैसे के दम पर परिवार को अपनी उंगलियों पर नचाता है। आरोप यह भी हैं कि वही भाई लगातार दबाव बनाकर रामकेश को मानसिक रूप से तोड़ रहा था। परिवार में सामंजस्य न होने और रिश्तों की मर्यादाओं को भूलकर चल रही प्रताड़ना ने युवक को इतना मजबूर कर दिया कि उसने अपनी जिंदगी खत्म करने का प्रयास किया।
Mahoba:पुलिस का मानवीय पहलू
रात का सन्नाटा गहरा चुका था। सुनसान सड़क के किनारे एक बाइक खड़ी थी, जिसके पास चौकी प्रभारी नरेश चंद्र निगम अपने साथियों के साथ खड़े थे। उन्हें इस बाइक के मालिक की तलाश थी। कुछ ही देर बाद टॉर्च की रोशनी ने अंधेरे को चीरते हुए उस युवक को ढूंढ निकाला, जो पास के एक पेड़ पर चढ़कर फांसी लगाने की कोशिश कर रहा था। जैसे ही नरेश चंद्र निगम की नजर उस पर पड़ी, उन्होंने जरा-सी भी हड़बड़ाहट नहीं दिखाई। परिस्थिति गंभीर थी, लेकिन उनकी वाणी में अद्भुत संयम और आत्मविश्वास झलक रहा था। उन्होंने सौहार्दपूर्ण शब्दों से युवक से बातचीत शुरू की और न्याय का भरोसा दिलाते हुए उसके टूटे हुए हौसले को संभालने की कोशिश की।
इस पूरी प्रक्रिया में उनके साथ खड़े पुलिसकर्मी भी खामोश बने रहे, ताकि स्थिति और बिगड़ने न पाए। अगर उस क्षण नरेश चंद्र निगम ने ज़रा भी जल्दबाज़ी या कठोरता दिखाई होती, तो शायद युवक क्षणिक आवेश में अपनी जिंदगी खत्म कर चुका होता। लेकिन उनकी सजगता, धैर्य और बुद्धिमानी ने एक जिंदगी को मौत के मुंह से बाहर खींच लिया। अंततः उन्होंने युवक को सुरक्षित नीचे उतारा और परिजनों से मिलवाकर यह संदेश दिया कि पुलिस केवल कानून का रक्षक ही नहीं, बल्कि जीवन का भी संरक्षक है। यह क्षण न केवल पुलिस की सतर्कता का प्रमाण था, बल्कि मानवीयता की मिसाल भी बन गया।
Mahoba:समाज के लिए बड़ी चेतावनी
यह घटना सिर्फ एक परिवार का झगड़ा नहीं, बल्कि उस अमानवीय सोच की परछाई है जिसमें रिश्तों को तोड़ने, परिवार को दबाने और मानसिक उत्पीड़न कर लोगों को आत्महत्या की ओर धकेलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जब कोई अपने ही घर का व्यक्ति शक्ति और पद का दुरुपयोग करके अपने परिवार को प्रताड़ित करे, तो यह समाज के लिए बेहद खतरनाक संदेश है।
महोबा की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि पुलिस की सजगता कितनी अहम है। अगर उस रात पुलिस ने तत्परता न दिखाई होती तो एक और परिवार मातम में डूब जाता। लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठ खड़ा हुआ है कि क्या समाज और प्रशासन उन कारणों पर गंभीरता से ध्यान देगा, जिनकी वजह से लोग अपनी जान देने पर मजबूर हो रहे हैं?
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