देहदान महायज्ञ में 308वीं आहुति, तो मृत्यु के बाद भी पढ़ाते रहेंगे कृष्णकांत, विस्तार से पढ़ने के करें क्लिक

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कानपुर। मृत्यु के बाद भी समाज को ज्ञान का प्रकाश देने की भावना ने पूर्व शिक्षक कृष्णकांत मिश्र को युग दधीचि देहदान अभियान का अमर स्तंभ बना दिया। 88 वर्षीय मिश्र जी, जो एल्डिको गार्डन स्टेट रायपुरवा कानपुर के निवासी थे, ने अपने संकल्प के अनुसार अपनी पार्थिव देह को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर के एनाटॉमी विभाग को समर्पित किया। यह अभियान के अंतर्गत दी गई 308वीं आहुति रही।

देहदान का संकल्प और पूरा हुआ व्रत

अभियान प्रमुख मनोज सेंगर ने जानकारी दी कि दिवंगत कृष्णकांत मिश्र, जो हीरालाल खन्ना इंटर कॉलेज में हिंदी के शिक्षक रहे थे, ने कुछ समय पूर्व ही देहदान का शपथपत्र भरा था। 29 सितंबर की शाम उनके निधन के बाद, उनके पुत्र दीपकृष्ण मिश्र ने अभियान प्रमुख से संपर्क कर इस संकल्प को पूरा करने का आग्रह किया। तत्पश्चात, तुरंत ही मेडिकल कॉलेज प्रबंधन से बात कर देहदान की सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गईं।

अगली सुबह, मनोज सेंगर अपनी पत्नी एवं अभियान महासचिव माधवी सेंगर के साथ दिवंगत शिक्षक के आवास पहुंचे। वहां से मेडिकल कॉलेज के शव वाहन द्वारा उनकी पार्थिव देह को एनाटॉमी विभाग में विधिवत समर्पित किया गया।

नारी सशक्तिकरण की मिसाल बनीं माधवी सेंगर

इस अवसर पर माधवी सेंगर ने मंत्रोच्चारण के साथ संस्कार सम्पन्न कराया। उन्होंने पुष्पांजलि, आरती और शांतिपाठ करते हुए मिश्र जी के देहदान को वैदिक परंपरा से पूरा किया। इस कार्य ने समाज में नारी सशक्तिकरण की एक अनूठी मिसाल प्रस्तुत की। उपस्थित लोगों ने इस पहल की सराहना की और इसे प्रेरणादायी बताया।

परिवार का रहा सहयोग और भावुक क्षण

समर्पण के समय मिश्र जी के पुत्र दीपकृष्ण मिश्र, पुत्री अर्चना मिश्र, पत्नी सरला मिश्र और उनके मित्र पंकज शुक्ल एवं प्रेमनारायण तिवारी भी उपस्थित रहे। सभी ने मिश्र जी के इस महान संकल्प को नमन करते हुए भावुक शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। परिवार ने कहा कि कृष्णकांत मिश्र जीवन भर शिक्षा और समाज सेवा के लिए समर्पित रहे, और मृत्यु के बाद भी उन्होंने ज्ञान की ज्योति जलाने का निर्णय लिया।

जानिए युग दधीचि अभियान का महत्व

अभियान प्रमुख मनोज सेंगर ने बताया कि युग दधीचि देहदान अभियान का उद्देश्य चिकित्साशास्त्र और शोध के लिए अधिक से अधिक देहदान को प्रोत्साहित करना है। उन्होंने कहा कि अब तक 308 लोगों ने इस अभियान के अंतर्गत अपनी देह चिकित्सा शिक्षा को समर्पित की है। इससे आने वाली पीढ़ियों को चिकित्सा क्षेत्र में बेहतर प्रशिक्षण और अनुसंधान की सुविधा मिल रही है।

समाज के लिए है प्रेरणा

कृष्णकांत मिश्र जी का यह योगदान न केवल उनके परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणादायी भी है। शिक्षक जीवनभर समाज को ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं, और मिश्र जी ने मृत्यु के बाद भी उसी पथ पर चलते हुए अपने शरीर को विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए समर्पित किया।

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