COP30 summit: यूरोप को सबक सिखाने के लिए भारत, ब्राजील और साउथ अफ्रीका एक साथ
यूरोप को चुनौती: भारत-ब्राज़ील-दक्षिण अफ्रीका का नया मंच तैयार
दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक समीकरण अब तेजी से बदल रहे हैं। विकासशील देशों ने तय कर लिया है कि वे यूरोप की कठोर जलवायु और व्यापार नीतियों के दबाव में नहीं झुकेंगे। यही वजह है कि भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका मिलकर एक नए अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म के निर्माण की ओर बढ़ रहे हैं। इस मंच का मकसद है—यूरोप द्वारा लगाए जा रहे कार्बन टैक्स और वनों की कटाई से जुड़े आयात प्रतिबंधों का संयुक्त रूप से जवाब देना।
नया प्लेटफॉर्म और COP30 की अहमियत
ब्राज़ील इस वर्ष नवंबर में होने वाले COP30 जलवायु सम्मेलन की मेज़बानी करेगा। इसी सम्मेलन के दौरान वह इस नए मंच का प्रस्ताव रखेगा और विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इसे औपचारिक रूप से पेश करेगा। प्रस्तावित मंच का उद्देश्य है कि जलवायु संरक्षण के नाम पर लगाए जाने वाले व्यापारिक प्रतिबंधों और करों का ठोस समाधान निकाला जा सके। इस मंच की खासियत होगी कि यह हर कुछ महीनों में बैठक करेगा और ऐसे व्यावहारिक सुझाव सामने लाएगा जो उत्पादकों और खरीदारों दोनों के लिए संतुलित हों।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मंच?
भारत उन देशों में है जिस पर यूरोप की नीतियों का सीधा प्रभाव पड़ रहा है। भारत यूरोप को बड़ी मात्रा में स्टील, सीमेंट, कॉफी, कोको और सोयाबीन जैसे उत्पाद निर्यात करता है। लेकिन यूरोपीय संघ के नए कानून लागू होने के बाद इन उत्पादों पर टैक्स बढ़ जाएगा। इससे भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा कमजोर होगी और भारत की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में स्थिति प्रभावित होगी।
भारत पहले भी कई मंचों पर कह चुका है कि जलवायु परिवर्तन से निपटना ज़रूरी है, लेकिन इसके बहाने व्यापार में रुकावट डालना अन्यायपूर्ण और पक्षपाती रवैया है। यही कारण है कि भारत इस नए प्लेटफॉर्म को अपनी आर्थिक मजबूती और व्यापारिक स्वतंत्रता का हथियार मान रहा है।
यूरोप की दलीलें और विकासशील देशों का जवाब
यूरोपीय संघ का कहना है कि उसका कार्बन बॉर्डर टैक्स कोई व्यापारिक दीवार नहीं है, बल्कि एक ऐसा कदम है जिससे यूरोप और बाहर की कंपनियां एक ही स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें। उनका दावा है कि यूरोप के उद्योग पहले से ही अपने कार्बन उत्सर्जन के लिए भारी शुल्क चुका रहे हैं, इसलिए विदेशी कंपनियों को भी इसकी भरपाई करनी चाहिए।
लेकिन विकासशील देशों का मानना है कि यूरोप का असली मकसद है—अपने बाज़ार को सुरक्षित रखना और बाहर से आने वाले सस्ते उत्पादों पर रोक लगाना। यही वजह है कि भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश अब एकजुट होकर इस रणनीति का मुकाबला करने की तैयारी में हैं।
बदलते वैश्विक समीकरण
यह नया मंच न केवल यूरोप की नीतियों के खिलाफ एक जवाब होगा, बल्कि यह दक्षिणी गोलार्ध के देशों की बढ़ती एकजुटता का प्रतीक भी बनेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार और जलवायु नीति में एक नया संतुलन स्थापित कर सकता है। विकासशील देशों की आवाज़ अब पहले से कहीं ज़्यादा बुलंद हो रही है और वे यूरोप जैसी ताकतों के दबाव में आने के बजाय अपनी शर्तों पर बातचीत करना चाहते हैं।
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