जब Premanand Maharaj ने कहा — “हर जन्म में मेरी किडनी खराब होती रहे” | भक्ति, त्याग और अध्यात्म का संगम
जहाँ आत्मा मिले परमात्मा से” — Premanand Maharaj की बीमारी नहीं, उनका त्याग बन गया अध्यात्म की अग्नि का दीप!
“जब देह ने कहा दर्द है, आत्मा ने कहा — यही तो भक्ति का परमानंद है!”
देश की धरती पर जब यह खबर पहुँची कि प्रेमानंद जी महाराज की किडनी खराब है, तब सिर्फ भक्तों के ही नहीं, बल्कि साधु-संतों, महात्माओं और अध्यात्मिक आस्थावानों के हृदय में जैसे एक कंपन-सा दौड़ गया।
लेकिन विडंबना देखिए — जहाँ आम आदमी बीमारी में निराश होता है, वहीं प्रेमानंद जी मुस्कुरा उठे।
उनकी वह मुस्कान जैसे ब्रह्म का संदेश थी —
“जो देह की पीड़ा को भी प्रभु का प्रसाद मान ले, वही सच्चा साधक होता है।”
और इसी पीड़ा के बीच जब बागेश्वर धाम पीठाधीश्वर पंडित धीरेन्द्र शास्त्री उनके दर्शन को पहुँचे, तो प्रेमानंद जी महाराज की कुटिया में केवल दो शरीर नहीं मिले — वहाँ आत्मा और परमात्मा का अद्भुत संगम हुआ।
धीरेन्द्र शास्त्री का दो बार दंडवत — और प्रेमानंद जी का वह दिव्य आलिंगन
जब पंडित धीरेन्द्र शास्त्री पहुंचे, उन्होंने प्रेमानंद जी के चरणों में झुककर दो बार दंडवत प्रणाम किया।
पहली बार प्रेमानंद जी ने उन्हें स्नेह से उठाया, गले लगाया और कहा —
“भक्त वो नहीं जो केवल बोले — भक्त वो है जो समर्पण में खो जाए।”
दूसरी बार जब धीरेन्द्र शास्त्री ने पुनः दंडवत किया, तब प्रेमानंद जी की आँखों में अश्रु छलक आए।
उन्होंने कहा —
“मैं भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि हर जन्म में मेरी किडनी खराब होती रहे,
ताकि प्रभु मुझे ऐसे दिव्य आत्माओं के दर्शन बार-बार कराते रहें।”
उनके ये शब्द किसी बीमारी की स्वीकारोक्ति नहीं थे — यह जीवन के सर्वोच्च ज्ञान का उद्घोष था —
कि “भक्ति में शरीर गौण है, भाव प्रधान।”
जहाँ भगवान राम ने वनवास में सीखा — त्याग ही जीवन का सार है
जब भगवान राम को वनवास मिला, तो अयोध्या में शोक था — लेकिन राम मुस्कुराए।
राजा दशरथ ने कहा — “पुत्र, यह तुम्हारे साथ अन्याय है।”
राम बोले —
“पिताश्री, मेरा तो सौभाग्य जाग उठा, अब मुझे ऋषियों, महात्माओं और तपस्वियों का सानिध्य मिलेगा।
यही तो जीवन का अर्थ है — सेवा, समर्पण और साधना।”
प्रेमानंद जी की मुस्कुराहट में वही भाव झलकता है —
जैसे राम ने वनवास को दंड नहीं, वरदान माना,
वैसे ही महाराज ने अपनी बीमारी को वरदान बना लिया।
वनवास के वे दिव्य संगम — जहाँ भगवान राम को मिला ज्ञान का सागर
भगवान राम जब वन में गए, तो हर स्थान पर उन्हें ऐसे महात्मा मिले जिन्होंने जीवन का नया अर्थ सिखाया।
आइए, उन्हीं प्रेरणास्रोतों की झलकियों को प्रेमानंद जी महाराज के वर्तमान जीवन से जोड़ते हैं —
ऋषि भारद्वाज से भक्ति का आचरण
जब भगवान राम चित्रकूट पहुँचे, तो भारद्वाज मुनि ने कहा —
“राम, सेवा ही साधना है।”
प्रेमानंद जी का जीवन भी यही कहता है —
“जो लोगों के हृदय में प्रकाश जला जाए, वही सच्चा तपस्वी है।”
अत्रि और अनसूया से त्याग की शिक्षा
राम जी जब ऋषि अत्रि और माता अनसूया के आश्रम पहुँचे, तो माता ने उन्हें सिखाया —
“सच्चा प्रेम वह है जो बिना शर्त हो।”
आज प्रेमानंद जी की वही भावना दिखाई देती है —
वो हर भक्त को बिना भेदभाव के गले लगाते हैं।
शबरी से निष्ठा की पराकाष्ठा
शबरी की जूठी बेर खाने वाले भगवान राम ने बताया —
“भक्ति में विधि नहीं, प्रेम है।”
प्रेमानंद जी भी अपने भक्तों से यही कहते हैं —
“तुम्हारे प्रेम में भगवान है, मेरे शरीर में नहीं।”
केवट से समानता का संदेश
केवट ने प्रभु के चरण धोए, लेकिन बदले में कुछ नहीं माँगा।
राम ने कहा — “केवट, तेरा प्रेम मेरा पार है।”
वैसे ही प्रेमानंद जी अपने शिष्यों से कहते हैं —
“जो बिना स्वार्थ के प्रेम करे, वही प्रभु का सच्चा नाविक है।”
ऋषि अगस्त्य से धर्म का सार
अगस्त्य मुनि ने राम को बताया — “धर्म वही जो दूसरों के कल्याण से जुड़ा हो।”
प्रेमानंद जी ने इसी धर्म को जिया है —
उनका हर प्रवचन, हर वचन किसी के जीवन में प्रकाश बनकर उतरता है।
जीवन का सन्देश — बीमारी नहीं, यह प्रभु का संवाद है
प्रेमानंद जी की बीमारी को देखकर जो समझता है कि यह दुख है, वह भूलता है —
यह एक दिव्य संवाद है, जहाँ प्रभु अपने भक्त से कह रहे हैं — “तुम अब मुझे समझने के काबिल हो गए।”
उनकी पीड़ा किसी देह की नहीं, बल्कि आत्मा के तप का प्रतीक है।
उनकी मुस्कान में वही प्रकाश है जो अग्नि के भीतर जलती आत्मा का तेज होता है।
धीरेन्द्र शास्त्री और प्रेमानंद जी — जब दो युगों का संगम हुआ
यह मुलाकात केवल दो संतों की नहीं थी, बल्कि यह भक्ति और समर्पण का ऐसा मिलन था,
जहाँ एक तरफ युवा ऊर्जा (धीरेन्द्र शास्त्री) थी और दूसरी ओर परिपक्व तपस्या (प्रेमानंद जी)।
दोनों ने जिस क्षण एक-दूसरे को गले लगाया,
वह क्षण समय के इतिहास में दर्ज हो गया —
“जहाँ प्रेम बोले, वहाँ शब्द मौन हो जाते हैं।”
आत्मा जब परमात्मा से मिलती है, तब किडनी नहीं, करुणा काम करती है
प्रेमानंद जी की बीमारी दरअसल आध्यात्मिक जागरण है।
उनका हर शब्द, हर दर्द और हर श्वास भक्तों को यह सिखा रही है।