पढ़िए हनुमान जी की भक्ति का अद्भुत प्रसंग: जब भगवान श्रीराम ने केले के पत्ते को दो भागों में दिया था बांट
भारतीय संस्कृति में भक्ति, समर्पण और सेवा का सर्वोच्च उदाहरण यदि किसी के रूप में देखा जाता है, तो वह है भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमानजी। उनकी भक्ति का एक अद्भुत प्रसंग “केले के पत्ते के बंटवारे” की कथा में देखने को मिलता है। यह कथा न केवल हनुमान जी की निष्ठा को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि सच्ची भक्ति में अहंकार का कोई स्थान नहीं होता।
लंका विजय के बाद अयोध्या में हुआ भव्य स्वागत
लंका विजय के बाद जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण सहित अयोध्या लौटे, तो सम्पूर्ण अयोध्या नगरी आनंद और उल्लास से भर उठी। नगर के हर कोने में दीप जलाए गए, और लोगों ने अपने आराध्य के स्वागत में भव्य आयोजन किए।
इस हर्षोल्लास के अवसर पर एक विशाल भोज का आयोजन किया गया, जिसमें समस्त वानर सेना को आमंत्रित किया गया। यह भोज केवल उत्सव का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस प्रेम और कृतज्ञता का भी प्रतीक था जो श्रीराम अपने सहयोगी वानरों के प्रति रखते थे।
वानर सेना को दी गई शिष्टाचार की सीख
सुग्रीव जी ने भोज से पहले वानर सेना को संबोधित करते हुए कहा— कि “यहां हम सब अतिथि हैं। हमें ऐसा कोई व्यवहार नहीं करना चाहिए जिससे अयोध्यावासी हमें अभद्र समझें। हमारी आचरण में मर्यादा और विनम्रता झलकनी चाहिए।”
वानरों ने इस बात को सहर्ष स्वीकार किया। उन्होंने सुझाव दिया कि कोई एक अगुवा उनके बीच रहे, जो उन्हें मार्गदर्शन देता रहे और यदि कहीं कोई अनुशासनहीनता हो, तो उसे रोक सके। इस कार्य के लिए हनुमानजी को अगुआ नियुक्त किया गया।
भोजन के समय हनुमान जी का धर्मसंकट
भोज के दिन हनुमानजी पूरे आयोजन की व्यवस्था में लगे हुए थे। सबके बैठने और परोसने की व्यवस्था पूर्ण करने के बाद, जब वे श्रीराम के पास पहुंचे, तो प्रभु ने स्नेहपूर्वक कहा— कि “हनुमानजी, आप भी हमारे साथ बैठकर भोजन करें।”
हनुमान जी के मन में गहरी दुविधा उत्पन्न हुई। एक ओर प्रभु की आज्ञा थी, दूसरी ओर उनके हृदय में यह विचार कि अपने प्रभु के समान आसन पर बैठना अनुचित होगा। वे यह भी नहीं चाहते थे कि उनके कारण प्रभु का मान घटे।
केले का पत्ता और श्रीराम की लीला
जब हनुमानजी ने देखा कि भोज में प्रयुक्त सभी केले के पत्ते (थालियाँ) समाप्त हो चुके हैं, तो वे चुपचाप एक ओर खड़े हो गए। यह देखकर भगवान श्रीराम ने उनके मन की बात समझ ली। उन्होंने पृथ्वी से कहा—“हे धरती, हनुमान के बैठने के लिए मेरे समीप थोड़ी भूमि और बढ़ा दो।”
क्षणभर में भूमि बढ़ गई। अब बैठने का स्थान तो मिल गया, लेकिन केले का पत्ता नहीं। श्रीराम मुस्कुराए और बोले—“हनुमान, तुम मेरे लिए पुत्र समान हो। आओ, तुम मेरे ही केले के पत्ते में भोजन करो।”
सेवक और स्वामी का अद्वितीय संवाद
हनुमानजी बोले—“प्रभु! मुझे आपके समान होने की कभी अभिलाषा नहीं रही। सेवक बनकर जो सुख मिलता है, वह बराबरी में नहीं मिलता। मैं आपके समान थाल में भोजन कैसे कर सकता हूँ?”
उनकी यह विनम्रता सुनकर श्रीराम ने कहा—“हनुमान, तुम मेरे हृदय में बसते हो। जो मेरी पूजा करता है पर तुम्हारी नहीं, उसकी आराधना अधूरी रहती है।”
इसके बाद प्रभु श्रीराम ने अपने दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली से केले के पत्ते के बीच एक रेखा खींच दी। वह पत्ता जुड़ा भी रहा और दो भागों में बंट भी गया। इस तरह एक ही पत्ते में भक्त और भगवान दोनों के लिए स्थान बन गया।
भक्ति का यह प्रतीक आज भी जीवित है
कहते हैं, उसी दिन से *केले के पत्ते* को सबसे शुद्ध और पवित्र माना जाने लगा। आज भी भारत में पूजा-पाठ, देवभोज या शुभ कार्यों में केले के पत्ते का प्रयोग किया जाता है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि उस दिव्य क्षण की स्मृति है जब भगवान श्रीराम ने अपने भक्त की भावना का सम्मान किया था।
भक्ति का सार: अहंकार नहीं, समर्पण
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्चा भक्त वह नहीं जो प्रभु के समान बैठना चाहे, बल्कि वह है जो *प्रभु के चरणों में समर्पण* का भाव रखे। हनुमानजी ने अपने आचरण से यह दिखाया कि भक्ति में विनम्रता ही सबसे बड़ा आभूषण है।
उनकी भक्ति से प्रभावित होकर भगवान श्रीराम ने भी स्पष्ट कहा था— “जहां हनुमान की पूजा नहीं, वहां मेरी आराधना भी पूर्ण नहीं।”