Bihar Politics: नीतीश कैबिनेट की जातीय बुनावट ने खोला नए राजनीतिक समीकरणों का पिटारा

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Bihar Politics: नीतीश कैबिनेट की जातीय बुनावट ने खोला नए राजनीतिक समीकरणों का पिटारा

Bihar Politics: नीतीश कैबिनेट की जातीय बुनावट ने खोला नए राजनीतिक समीकरणों का पिटारा

बिहार की राजनीति में वह पल आ चुका है जब सत्ता का गणित सिर्फ कुर्सियों से नहीं, समाज की नब्ज़ से तय हो रहा है। गांधी मैदान की गर्माहट में शपथ ग्रहण के साथ जब नई सरकार अस्तित्व में आई, उसी क्षण यह साफ हो गया था कि आने वाला दौर सिर्फ सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व के नए अध्याय का होगा।
इस बार सत्ता के गलियारों में जो फॉर्मूला गूँजा है, वह साफ बताता है—बिहार की राजनीति अब सामाजिक संतुलन, जातीय हिस्सेदारी और वोटबैंक संरक्षण की गहराई तक उतर चुकी है।

 नई सरकार, नया समीकरण, कौन कितना मजबूत? कौन कितना प्रतिनिधित्वशाली?

नीतीश कुमार की अगुवाई में बनी नई एनडीए सरकार ने ऐसी कैबिनेट तैयार की है, जिसे देखकर बिहार की जातीय संरचना और राजनीतिक प्राथमिकताएँ साफ झलकती हैं। सत्ता की चाबी भले नीतीश के हाथ आई हो, पर मंत्रिमंडल की संरचना बताती है कि नियंत्रक भूमिका में भाजपा खुद को बड़े साझेदार की तरह स्थापित कर चुकी है।

अगड़ी जातियों की ताकत — कुल 8 मंत्री

मंत्रिमंडल में अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व संख्या और प्रभाव—दोनों रूपों में काफी महत्वपूर्ण है।
ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ—सभी परंपरागत राजनीतिक प्रभाव रखने वाले तबकों को जगह मिली है।
यह उस राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके माध्यम से सत्ता गठबंधन ने अपने पारंपरिक कोर वोटबैंक को मजबूती से थामने का संदेश दिया है।

सबसे बड़ी हिस्सेदारी, ओबीसी–ईबीसी और वैश्य समाज — कुल 13 मंत्री

बिहार की सामाजिक हकीकत बताती है कि इस वर्ग की उपेक्षा कोई भी राजनीतिक दल नहीं कर सकता।
नई कैबिनेट में इस समुदाय की उपस्थिति सबसे ज्यादा है—

ओबीसी

ईबीसी

वैश्य समाज

यह वही वर्ग है जो राज्य की राजनीति का वास्तविक पॉवरहाउस बना हुआ है।
सत्ता गठबंधन ने इस समुदाय को उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व देकर यह संकेत दिया है कि भविष्य की राजनीति इसी सामाजिक तबके पर टिकेगी।

दलित समुदाय की सशक्त एंट्री — 5 मंत्री

दलित समाज बिहार के सामाजिक-पॉलिटिकल ढांचे में बड़ा स्तंभ है।
नई सरकार में 5 चेहरे इसी समुदाय से लिए गए हैं।
यह भराव सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उस सामाजिक विस्तार का संकेत है, जिसे हासिल किए बिना कोई गठबंधन स्थाई राजनीतिक मजबूती नहीं पा सकता।

मुस्लिम प्रतिनिधित्व — सीमित लेकिन रणनीतिक

मुस्लिम समुदाय से प्रतिनिधित्व बेहद सीमित है, पर जो चेहरा शामिल किया गया है, वह प्रतीकात्मक से कहीं अधिक रणनीतिक समझा जा रहा है।
यह कदम सरकार की सामाजिक-संतुलन वाली छवि को प्रदर्शित करता है।

यह कैबिनेट किस संदेश की ओर इशारा करती है?

सत्ता का नया फार्मूला जातीय गणित को केंद्र में रखता है।

 भाजपा की भूमिका ‘बड़े भाई’ जैसी मजबूत और निर्णायक हो चुकी है।
नीतीश कुमार की राजनीतिक संतुलन साधने की कला फिर से केंद्र में है।
ओबीसी–ईबीसी वर्ग को सबसे बड़ा प्रतिनिधित्व — यह बिहार की नई पॉलिटिकल धुरी है।
दलित चेहरे बतौर सामाजिक मजबूती और राजनीतिक विस्तार।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ मंत्री + उनकी जाति

सम्राट चौधरी — कुशवाहा (पिछड़ी जाति)

विजय कुमार सिन्हा — भूमिहार (उच्च / सवर्ण)

विजय कुमार चौधरी — भूमिहार (सवर्ण)

बिजेंद्र प्रसाद यादव — यादव (OBC)

श्रवण कुमार — कुर्मी (OBC)

मंगल पांडेय — ब्राह्मण (सवर्ण)

डॉ. दिलीप जायसवाल — वैश्य (व्यापारी / सवर्ण‑व्यापारी)

अशोक चौधरी — दलित

लेशी सिंह — राजपूत (सवर्ण)

मदन सहनी — निषाद (EBC / पिछड़ा‑समूह)

नितिन नवीन — कायस्थ (उच्च जाति)

राम कृपाल यादव — यादव (OBC)

संतोष कुमार सुमन — दलित

सुनील कुमार — दलित

जमा खान — मुस्लिम

संजय सिंह “टाइगर” — राजपूत (सवर्ण)

अरुण शंकर प्रसाद — वैश्य (सवर्ण‑व्यापारी)

सुरेंद्र मेहता — कुशवाहा (पिछड़ी)

नारायण प्रसाद — वैश्य

रमा निषाद — निषाद (EBC)

बिहार की राजनीति अब जातीय प्रतिनिधित्व के नए युग में कदम रख चुकी है

नई सरकार की संरचना बताती है कि बिहार की राजनीति अब किसी एक वर्ग के भरोसे नहीं चल सकती।
यह नया मंत्रिमंडल एक ऐसी तस्वीर पेश करता है, जिसमें हर जाति, हर तबका और हर शक्ति-समूह को खास जगह देकर भविष्य के राजनीतिक चक्रव्यूह को साधने की कोशिश की गई है।

बिहार का आने वाला राजनीतिक समय इस संतुलन, इस बुनावट और इस रणनीति पर ही टिका दिखाई देता है।

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