अनंत चतुर्दशी 2025: आज करें भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा, जानें व्रत कथा और धार्मिक महत्व
अनंत चतुर्दशी हिन्दू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो गणेश चतुर्दशी के दसवें दिन मनाया जाता है। प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की विशेष पूजा-अर्चना होती है। साथ ही जैन धर्म में भी इसका महत्व है, क्योंकि इसी दिन उनके पर्युषण पर्व का समापन होता है।
जानें धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के साथ शेषनाग की पूजा का भी विधान है। शेषनाग को सर्वव्यापी माना जाता है, जिनके फन पर पृथ्वी टिकी मानी जाती है। अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु को रेशमी धागे से बने *अनन्तसूत्र* को अर्पित किया जाता है और इसे श्रद्धापूर्वक कलाई पर बांधा जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह अनन्त सूत्र रक्षा कवच की तरह कार्य करता है और दरिद्रता को दूर करता है।
पढ़िए पौराणिक कथाएँ
अनंत चतुर्दशी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। महाभारत के अनुसार जब पांडव वनवास में थे, तब श्रीकृष्ण ने द्रौपदी और पांडवों को अनंत चतुर्दशी व्रत का महत्व बताया। इस व्रत के प्रभाव से ही पांडवों ने कौरवों पर विजय प्राप्त की और अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त किया।
इसके अतिरिक्त एक और प्रसिद्ध कथा कौण्डिन्य ऋषि और उनकी पत्नी सुशीला से जुड़ी है। कहा जाता है कि सुशीला ने नदी तट पर स्त्रियों को यह व्रत करते देखा और स्वयं भी श्रद्धा से व्रत किया। इसके फलस्वरूप उनके जीवन से दरिद्रता दूर हो गई और ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। परंतु जब कौण्डिन्य ने अनन्त सूत्र को जादू-टोना समझ कर तोड़ दिया, तो उनका समस्त ऐश्वर्य नष्ट हो गया। बाद में 14 वर्षों तक व्रत करने के पश्चात भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें पुनः सुख-संपदा प्रदान की।
जैन धर्म में महत्व
जैन परंपरा में भी यह दिन अत्यंत पवित्र माना जाता है। माना जाता है कि इसी दिन 12वें तीर्थंकर श्री वासुपूज्य जी ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसलिए जैन धर्मावलंबियों के लिए यह दिन विशेष आस्था का प्रतीक है।
व्रत का महत्व
संक्षेप में, अनंत चतुर्दशी का व्रत न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह जीवन में सुख, समृद्धि और दरिद्रता से मुक्ति का मार्ग भी माना जाता है। जो श्रद्धा और विश्वास के साथ इस व्रत को करता है, उसके जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और स्थिरता आती है।