गृहमंत्री अमित शाह का आदेश: 1974 के बाद देश में हुए विरोध प्रदर्शनों का होगा अध्ययन, विदेशी फंडिंग पर भी नज़र

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नई दिल्ली। देश में वर्षों से समय-समय पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला चलता आ रहा है। अब केंद्र सरकार ने इस पर गंभीर पहल करते हुए एक व्यापक अध्ययन कराने का निर्णय लिया है। गृह मंत्रालय ने आदेश दिया है कि 1974 के बाद भारत में हुए सभी प्रमुख विरोध प्रदर्शनों का गहन अध्ययन किया जाएगा। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना है कि किन मुद्दों पर प्रदर्शन हुए, उनका स्वरूप क्या रहा और समय के साथ उनके पैटर्न में किस प्रकार बदलाव आया।

विस्तार से पढ़िए शाह साहब का आदेश 

गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया है कि विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा हैं, लेकिन यह भी आवश्यक है कि यह पता लगाया जाए कि कहीं इन प्रदर्शनों के पीछे कोई विदेशी संगठन, बाहरी फंडिंग या अन्य किसी प्रकार का हस्तक्षेप तो नहीं रहा। इसके माध्यम से सरकार यह जान सकेगी कि भारत में हुए आंदोलनों की जड़ें कितनी स्वदेशी थीं और किस हद तक बाहरी तत्व इसमें सक्रिय रहे।

अध्ययन में उन मुद्दों को प्राथमिकता दी जाएगी जिन पर बड़े स्तर पर जनआंदोलन हुए। इनमें किसान आंदोलन, छात्र आंदोलन, श्रमिक आंदोलन और हाल के वर्षों में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और अन्य सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को भी शामिल किया जा सकता है। इसके साथ ही **प्रदर्शन के मॉड्यूल और रणनीति** का भी विश्लेषण किया जाएगा, ताकि यह समझा जा सके कि विरोध किस तरीके से संगठित किए गए और उनका समाज पर क्या प्रभाव पड़ा।

इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाएगा कि अलग-अलग कालखंडों में प्रदर्शनों के तरीकों में किस प्रकार का परिवर्तन आया। उदाहरण के लिए, पहले प्रदर्शन मुख्यतः धरना और जुलूस तक सीमित रहते थे, जबकि अब सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स भी आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। इस दृष्टि से यह अध्ययन न केवल वर्तमान परिस्थितियों को समझने में मदद करेगा, बल्कि भविष्य की नीति निर्माण में भी सहायक सिद्ध होगा।

मजबूती प्रदान करेगा यह फैसला 

गृह मंत्रालय का मानना है कि पारदर्शिता और निष्पक्षता से किया गया यह अध्ययन भारत में लोकतंत्र की मजबूती को और सुदृढ़ करेगा। क्योंकि इससे यह तय किया जा सकेगा कि genuine (वास्तविक) जनहित के मुद्दे और बाहरी प्रभाव से प्रेरित गतिविधियों में क्या अंतर है।

स्पष्ट है कि यह कदम सरकार की उस नीति का हिस्सा है जिसके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस अध्ययन के नतीजे क्या सामने आते हैं और उनसे किस प्रकार की नीतियां बनाई जाती हैं।

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